मध्यकालीन इतिहास में महिलाओ का स्थान
मुस्लिम समाज में भी हिन्दूओं की तरह महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की थी। उनके अधिकारों एवं स्तर में काफी गिरावट आई तथा उन्हें पुरुषों पर आश्रित स्वीकार किया जाने लगा। मुस्लिम समाज में विभिन्न वर्गों की स्त्रियों की दशा अन्य वर्गां की स्त्रियों से अच्छी थी। मुस्लिम शासकों ने राजमहल में हरम की व्यवस्था की थी। जहाँ उनकी पत्नियाँ राजपरिवार की महिलायें तथा उपपत्नियाँ निवास करती थी। उनकी सेवा में अनेक दासियाँ एवं महिला सेविकायें होती थी। साधारणतया शासक की माँ को हरम की प्रथम महिला का सम्मान प्राप्त होता था तथा उसके पश्चात् शासक की प्रथम पत्नी का विशेष स्थान था। हरम में स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा की भी उचित व्यवस्था थी। मुगल हरम की महिलाओं ने समकालीन राजनीति एवं संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में अपना विशेष योगदान दिया। हुमायूँ की पत्नी हमीदा बानू बेगम एक बुद्धिमति महिला थी जिसने हुमायूँ एवं अपने पुत्र अकबर को अपने बहुमूल्य परामर्शों द्वारा लाभान्वित किया। अकबर की पत्नी सलीमा बेगम एक दूरदर्शी एवं संतुलित महिला थी। जहाँगीर के शासनकाल की राजनीति में नूरजहाँ की विशेष भूमिका रही। शाहजहाँ की प्रमुख सलाहकार उसकी पत्नी मुमताजमहल थी तथा उसकी मृत्योपरान्त उसका स्थान उसकी पुत्री जहाँआरा ने ले लिया। बाबर की पुत्री गुलबदन बानू बेगम की साहित्यिकता का परिचय उसकी कृति हुमायूँनामा से प्राप्त होता है। जहाँआरा एक उच्चकोटि की कवियित्री थी। हमिदाबानू बेगम ने हुमायूँ के मकबरे तथा नूरजहाँ ने एतमाद-उद-दौला के मकबरे का निर्माण करवाया था जो उनकी वास्तुकला के प्रति ज्ञान को प्रदर्शित करता है। इन दोनों मकबरों ने मुगल वास्तुकला को नवीन उच्चाईयाँ प्रदान की है। नूरजहाँ ने समकालीन भूषाचार को भी प्रभावित किया तथा उसकी माँ अस्मत बेगम ने गुलाब के इत्र का अविष्कार किया था।
उच्च उमरावर्ग की गणना शासक वर्ग में की जाती थी, जो सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन में शासकों का अनुकरण करते थे। शाही हरम की भाँति उनके यहाँ भी हरम होते थे, जहाँ उनकी पत्नियाँ, पुत्रियाँ, उपपत्नियाँ तथा अन्य महिलाएँ निवास करती थी। उमरावर्ग की स्त्रियों को सभी सुख एवं सुविधायें उपलब्ध थी। हिन्दू शासक वर्ग में स्वायत्त शासक, जमींदार, जागीरदार और राजपूत सरदार शामिल थे। इस वर्ग की स्त्रियों का जीवन मुस्लिम वर्ग की स्त्रियों की ही भाँति सुखमय एवं वैभवपूर्ण था। मध्यम वर्ग के अंतर्गत, शिक्षक, हकीम, ज्योतिषी, साधारण अमीर, मध्यम जमींदार, वेतनभोगी राजकीय कर्मचारी एवं व्यापारी आदि सम्मिलित थे। उच्चवर्ग की तुलना में मध्यवर्ग कम सम्पन्न था, परन्तु इस वर्ग की मुस्लिम एवं हिन्दू स्त्रियों की दशा लगभग समान थी तथा वे सुख एवं सुविधाओं का उपभोग करती। शिल्पकार कृषक एवं छोटे व्यवसायी वर्ग की स्त्रियों की दशा मध्यमवर्ग की स्त्रियों से निम्नŸार थी। इस वर्ग की मुस्लिम एवं हिन्दू स्त्रियाँ अपने पति के व्यवसायों में भी सहयोग देती थी। उन्हें एक ही साथ दो मोर्चों पर घर और बाहर काम करना पड़ता था, परन्तु उनकी दशा संतोषजनक थी। जहाँ तक निम्नवर्ग की निर्धन एवं निःसहाय स्त्रियों का प्रश्न है उनकी दशा दयनीय थी। वे उच्च एवं मध्यम वर्ग के परिवारों की सेवा करके अपना जीविकोपार्जन करती थी।
इस्लाम में मानव समानता को स्वीकार किया गया है तभी सभी मुसलमान को समान अधिकार दिए गये है। मुहम्मद साहब ने स्त्री पुरुष को समान स्वीकार किया। पवित्र कुरान में एक तरफ स्त्रियों की प्रशंसा की गई है तथा उसे परिवार में शिशु चरित्र के निर्माण के लिए उतरदायी स्वीकार किया गया है। वहीं दूसरी ओर कुरान कहता है कि पुत्र हमेशा पुत्री की तुलना में प्राथमिकता पाता है क्योंकि पुरुष स्त्रियों के निगराँ और जिम्मेदार है, इसलिए कि अल्लाह ने एक को दूसरे पर बड़ाई दी है। नेक स्त्रियाँ आज्ञापालन करनेवाली होती है। सरकश स्त्रियों को समझाओं, विस्तर पर उन्हें तन्हा छोड़ों और न मानने पर उन्हें पीटो। यह खुदा की ख्वाहिश है। अन्यत्र कहा गया है कि ‘‘पुरुष स्त्रियों से श्रेष्ठ है, पुरुष का हिस्सा दो स्त्रियों के बराबर है।
हिन्दूओं और मुसलमानों दोनां सम्प्रदायों में पुत्री के जन्म को दुभार्ग्यपूर्ण घटना माना जाता था। पुत्री के जन्म का ठंडा स्वागत किया जाता था । ऐसा रुख न केवल परिवार के पुरुष सदस्यों का ही नहीं होता था बल्कि बेटी की माँ और दादी का भी होता था। यदि हिन्दू महिलाएँ लगातार पुत्रियों को जन्म देती थी तो उसे प्रायश्चित करना पड़ता था। जेम्स टॉड के अनुसार जब परिवार में पुत्री का जन्म होता था तो न माँ से उस सम्बन्ध में उत्सुकतापूर्वक पूछ-ताछ की जाती थी और न ही नवजात शिशु का बधाईयों से स्वागत किया जाता था। पुत्री के जन्म पर बहुत कम खुशी होती थी क्योंकि पुत्रियाँ अपने पूर्वजों की शांति के लिए आवश्यक कार्यविधियाँ नहीं कर सकती थी और साथ ही उन्हें अनावश्यक खर्च का कारण माना जाता था। पुत्र की माँ का आदर किया जाता था जबकि उसे पुत्री होने पर भला-बुरा कहा जाता था। भारत में अवांछित पुत्री दया का पात्र होती थी। कुछ परिवारों में माता-पिता द्वारा उसे इसलिए डॉँटा-फटकारा जाता था कि वह लड़की है। यदि बच्चा शिशु हुआ तो माँ को इक्कीस दिन अस्वच्छ माना जाता था और अगर बच्ची हुई तो यह अवधि एक महीना और बढ़ा दी जाती थी। जाटों में एक विचित्र प्रथा का चलन था, उनके यहाँ पुत्र का जन्म होता था तो कहा जाता कि पुत्री का जन्म हुआ है। यदि कन्या का जन्म होता था, तो कहा जाता था कि एक पत्थर पैदा हुआ है।
मध्यकाल में हिन्दू स्त्रियों की अपेक्षा मुस्लिम महिलाओं को कुछ अधिक साम्पिŸाक अधिकार प्राप्त थे। कुरान में उल्लिखित है कि पुरुषों ने जो कुछ कमाया है, उसके अनुसार उनका हिस्सा है और महिलाओं ने जो कुछ कमाया है, वह उनकी सम्पति है। अल्लाह! तुम्हारी औलाद के बारें में तुम्हें वसीयत करता है कि पुरुषो का हिस्सा दो स्त्रियों के बराबर हो या दो से अधिक लड़कियाँ हो तो उनको हिस्सा उस रकम का छठा भाग है और यदि उनके औलाद न हो और उसके माता-पिता ही उसके वारिस हो तो उसके माता का हिस्सा तिहाई होगा। इस आयात से यह निदिर्ष्ट होता है कि लड़की का हिस्सा लड़के के आधा रखकर उसे कमतर समझा गया। फिर भी जहाँ हिन्दू समाज में महिलाओं को कोई अधिकार नहीं था उसकी अपेक्षा यह एक क्रांतिकारी कदम कहा जा सकता है। इस आयत में यह भी ध्यान रखा गया है कि शादी के बाद लड़की पति की सम्पत्ति में भी हकदार हेगी। सुर-अन-निसा की 12 वीं आयत पति को पत्नी की छोड़ी हुई सम्पत्ति का पूरी तरह मालिक नहीं बनाती। उसके अनुसार पत्नी को कोई औलाद नहीं है तो उसकी सम्पत्ति में पति का आधा भाग ही होगा और यदि कोई संतान है तो पति एक-चौथाई भाग का ही भागीदार होगा।
सम्पत्ति के उत्तराधिकार के विषय में हिन्दू स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं था। यद्यपि पुत्री के रूप में स्त्रियों का अपने पिता की सम्पत्ति में कोई भाग नहीं होता था फिर भी प्रत्येक अविवाहित पुत्री को अपने भाईयों को मिलने वाले पितृधन का एक - चौथाई भाग प्राप्त करने का अधिकार था। मृत्यु के पश्चात् माँ की सम्पत्ति पुत्रों एवं अविवाहित पुत्रियों में समान रुप से बाँटी जाती थी। विवाहित पुत्रियों को केवल सम्मान स्वरुप थोड़ा ही भाग मिलता था। 12 वीं सदी तक आते - आते सम्पूर्ण देश में विधवा के मृत पति का उत्तराधिकारी होने का सिद्वान्त व्यावहारिक रुप में स्वीकार कर लिया गया। स्त्री को स्वयं की सम्पत्ति जिसके ऊपर उसका पूरा अधिकार होता था वह स्त्रीधन था। इस समय तक स्त्रीधन का क्षेत्र व्यापक करके उसमें उत्तराधिकार एवं विभाजन की सम्पत्ति को भी सम्मिलित कर लिया गया।
मध्यकाल में स्त्रियों की शिक्षा की प्रगति शासकों एवं समृद्ध लोगों के संरक्षण में धीमी गति से हुई । शासकों एवं अन्य शिक्षाप्रेमी व्यक्तियों ने महिला शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास किया। हिन्दू और मुस्लिम स्त्रियों ने धार्मिक और उच्च प्रकार की साहित्यिक कृतियों में रूचि ली। इन सबके बावजूद विदूषी हिन्दू स्त्रियों का अभाव ही रहा। जिसका प्रमुख कारण पर्दाप्रथा और बाल विवाह था। इसका अर्थ यह नहीं है कि उस समय अच्छे शैक्षिक संस्थान पर्याप्त मात्रा में नहीं थे। सच पूछा जाय तो उनकी शिक्षा की उपेक्षा की जाती थी। इब्नबतूता हनौर के शासक को महान शिक्षाप्रेमी बताते हुए कहता है कि हनौर की सारी महिलाओं ने कुरान रट डाला था, वहाँ लड़कों के लिए 23 और लड़कियों के लिए 13 विद्यालय स्थापित थे। वाकियात-इ-मुस्तौकी का लेखक शेख रिजकुल्ला लिखता है कि इस अवधि में शिक्षा की स्वच्छ धारा पूर्वकाल की तरह ही प्रवाहित हो रही थी। स्त्रियों को सामान्य पाठ्यक्रम के अनुसार ही पढ़ाया जा रहा था तथा साथ ही उन्हें विभिन्न कलाओं और विज्ञानों की भी शिक्षा दी जाती थी।
सामान्यतः शासक और उच्चवर्गां के लोग अपनी पुत्रियों और बहनों को शासनकार्य में प्रशिक्षित करते थे। जब कभी आवश्यक होता था तो वे शिक्षा की स्वयं देख-रेख करते थे और प्रशिक्षण के लिए विशिष्ट एवं सामान्य जन के लिए दुर्लभ शिक्षा के निपुण और विद्वान शिक्षकों को नियुक्त करते थे। ऐसी स्थिति के उनलोगों के लिए यह शोभा की बात नहीं थी कि विभिन्न परिवारों की स्त्रियों के लिए शिक्षा की कोई व्यवस्था न थी तथा लड़को की तुलना में लड़कियों की शिक्षा की सुविधाएँ नगण्य थी। इसका एक कारण यह था कि स्वयं लड़कियों के अभिभावक स्त्री शिक्षा के प्रति अनमनयस्क थे और प्रगतिशील एवं व्यापक से व्यापकतर होती जानेवाली स्त्रीशिक्षा के मार्ग में उनके सामाजिक बाध्यताएँ एवं पूर्वाग्रह वास्तविक बाधक थे। पर्दाप्रथा एक ऐसी ही सामाजिक बाध्यता थी जिसके अधीन स्त्रियों को घर की चाहरदीवारी के अंदर बंद रहना पड़ता था। सुसंस्कृत और उच्चवर्गों की हिन्दू एवं मुस्लिम महिलाएँ बाहरी आदमियों और अपने ही परिवार के बुर्जुग सदस्यों के समक्ष नहीं आ सकती थी। इस सामाजिक बाध्यता के कारण स्त्रियों की शिक्षा के लिए इच्छुक अभिभावक भी खुद अपने परिवार की स्त्रियों को सर्वांगपूर्ण शिक्षा देने से वंचित रहते थे। इसलिए स्वभावतः प्रचलित सामाजिक परम्पराओं के कारण उनकी बौद्धिक क्षमताएँ विकसित नहीं हो पाती थी।
बालविवाह हिन्दू एवं मुस्लिम सम्प्रदायों में महिला शिक्षा के लिए एक बड़ी बाधा थी क्योंकि विवाह के बाद लड़कियों को शिक्षा का अवसर ही नहीं मिल पाता था। ऐसे अस्वस्थ्यकर सामाजिक परिवेश में मध्य आयुवाली महिलाओं को साक्षरता की उत्कृष्ट उपलब्धियों तक पहुँच पाना असंभव था। सामुहिक निरक्षरता के कारण समाज उपर्युक्त बुराईयों में जकड़ा हुआ था। गाँववालों और निचले वर्गों की महिलाओं को तो शिक्षा प्राप्त करने में और भी असुविधायें थी। वे घरेलू काम-काज के बोझ से इतनी दुःखी होती थी कि उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का अवसर ही नहीं मिल पाता था।
मध्यकाल में व्यापक स्तर पर स्त्रीशिक्षा व्यवहारतः एक अनजानी चीज थी। शिक्षा केवल शाही और अभिजात वर्गो की महिलाओं तक ही सीमित थी। कुछ हद तक समाज के मध्यवर्ग की स्त्रियाँ भी शिक्षा पा जाती थीय पर जहाँ तक निर्धन एवं निचले वर्गों की महिलाओं का सम्बन्ध था, वे अपना पेट पालने में ही बूरी तरह व्यस्त रहती थी और बौद्धिक प्रशिक्षण के लिए समय न निकाल पाती थी। हिन्दू महिलाओं को सुसंस्कृत बनाने के प्रति ध्यान न देते थे। फलतः लड़कियॉँ निरक्षरता में पलने-बढ़ने को बाध्य थी जो भी थोड़ी बहुत बौद्धिक शिक्षा उन्हें मिल पाती थी वह भी अपनी मॉ से। वह शिक्षा अनेक विषयों के सम्बन्ध में होती थी और मौखिक रूप से दी जाती थी।45 प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद विशेषकर मध्यवर्ग की हिन्दू लड़कियों को अपनी पढ़ाई आगे बढ़ाने की बहुत कम सुविधायें मिल पाती थी। यद्यपि उच्चवर्गों की कुछ महिलायें राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में अतीव सक्रिय और साहित्यिक कार्यकलाप में पूर्णतः निपुण थी, पर सामान्य परिवार की लड़कियाँ अधिकांशतः अशिक्षित ही रह जाती थी।46
हिन्दू समाज में पर्दाप्रथा का व्यापक प्रचलन मुस्लिम आक्रमण के प्रभाव से हुआ था। मुस्लिम समाज में पर्दा का पालन कड़ाई से किया जाता था। पर्दा एक इस्लामी शब्द है जो अरबी भाषा से आया है। इसका अर्थ है ढ़कना या अलग करना। पर्दा का एक पहलू है बुर्का का चलन। बुर्का एक तरह का घुॅँघट है जो मुस्लिम समुदाय की महिलायें और लड़कियॉँ कुछ खास जगहों पर खुद को पुरुषों की निगाह से दूर रखने के लिए इस्तेमाल में लाती थी। भारत में हिन्दूओं में पर्दाप्रथा इस्लाम की देन है। इस्लाम के प्रभाव से तथा इस्लामी आक्रमण के समय हिन्दू स्त्रियाँ भी पर्दा करने लगी थी। एन0 एम0 जफ्फार ने पर्दा को हिन्दू स्त्रियों के लिए धार्मिक कत्तर्व्य बताया है। धार्मिक ग्रंथों के उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाने का प्रयास किया है कि पर्दा त्यागना हिन्दू समाज में निन्दनीय समझा जाता था। हिन्दू समाज में पर्दा का पालन अनिवार्य रुप से होता था।
मुसलमानों के आगमन से पूर्व भारत में पर्दा प्रथा का अभाव था। हिन्दू स्त्रियॉँ केवल घूॅँघट के द्वारा ही अपने मुॅँह ढँका करती थी। किन्तु मुसलमानों के आगमन के पश्चात् उनकी संस्कृति के प्रभावस्वरुप पर्दाप्रथा को विशेष बल मिला और मुसलमानों की भाँॅति हिन्दुओं में भी पर्दाप्रथा पहले की अपेक्षा कठोर हो गई । कुछ मुस्लिम शासकां ने कट्टरपंथी नीति के कारण पर्दाप्रथा को बढ़ावा दिया । तो कुछ ऐसी महिलाएँ हुई जिन्हांने इसे चुनौती पेश की। रजिया सुल्तान शायद पहली मुस्लिम महिला थी जिसने लालवस्त्र पहनकर चाँदनी चौक में जनता के सम्मुख बिना पर्दे के खड़ी हुई और सुल्तान के विरुद्व बगावत करते हुए न्याय की मॉँग की थी। बाद में दिल्ली का सुल्तान बनने के बाद वह पुरुषवेश में आवरणहीन चेहरे के साथ शाही िंसंहासन पर आसीन होती थी और सरदारों के बीच बेखौफ होकर आती जाती थी। दूसरी ओर सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने पर्दाप्रथा के प्रचार के लिए राज्य की ओर से प्रोत्साहन प्रदान किया था। वह पहला सुल्तान था जिसने मुस्लिम औरतों को दिल्ली के बाहर स्थित मजारों पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था अतः अमीरो की स्त्रियों ने डोलियों अथवा पालकियों में निकलना बंद कर दिया था। उदारवादी प्रवृति का सम्राट होने के बावजूद अकबर ने पर्दाप्रथा का समर्थन किया था। बदायूॅँनी के अनुसार यदि कोई युवती बिना बुरका अथवा बिना परदा किए सड़कों एवं बाजारों में घूमती हुई पाई जाती थी तो उसको वेश्यालय भेज दिया जाता था जहाँॅ वह वेश्या के पेशे को ग्रहण कर लिया करती थी। नूरजहाँॅ ने पर्दा प्रथा को नकारते हुए अपने पति के साथ खुले दरबार में हाजिर होती थी तथा पति की उपस्थित में अमीरों को आदेश दिया करती थी। मध्यकालीन भारत में पर्दा का इतनी कड़ाई से पालन होता था कि उदारवादी विचार रखनेवाले अमीर खुशरो ने भी; जिसने ‘लैला मजनूँ’ नामक अपनी कृति में इसका विरोध करते हुए इसकी बुराईयों का उल्लेख किया था; स्वयं अपनी पुत्री को इस बात का आदेश दे रखा था कि वह अपनी पीठ दरवाजे की ओर और मुँह दीवार की ओर करके बैठे ताकि कोई उसे देख न सके।
उच्चवर्ग के हिन्दुओं ने भी अपनी रक्त शुद्धता को बनाये रखने के लिए पर्दा का कठोरता से पालन किया। इस वर्ग में पर्दा सम्मान का माप रहा है जितनी ऊँची समाज में स्थिति रहेगी, स्त्रियॉँ उतनी ही अलग होगी। राजा और अमीर उमरा अपनी स्त्रियों के लिए पूर्णतः ढँॅकी और ताला लगी डोलियों का उपयोग करते थे। पर्दाप्रथा का कठोरता से पालन इस कदर बढ़ गया था कि उच्चवर्ग की बीमार स्त्रियों को हकीम या वैद्य भी नहीं देख सकते थे। उनकी बीमारी का पता उनके शरीर के कपड़ों से लगाया जाता था। यदि किसी स्त्री द्वारा पर्दा का कड़ाई से पालन नहीं किया जाता तो उसका पति तत्काल उसे तलाक दे देता था। हिन्दू अमीर भी मुस्लिम शासकों के तौर-तरीके अपनाने में संकेच नहीं करते थे क्योंकि उससे सामाजिक रुतवे में अभिवृद्धि होती थी।49 मुख्यतया आर्थिक कारणों से समाज की निम्न जातियों की स्त्रियों को पर्दे में नहीं रहना पड़ता था। कृषक स्त्रियों का विशाल समुदाय कोई चादर या विशेष रूप से बना परदा या बुर्का नहीं पहनता था और अलग-थलग नहीं रहता था। उसके हाँथ-पाँव और चेहरे खुले रहते थे। भारतीय किसान अधिक पत्नियाँ रखने का व्यय भी नहीं कर सकते थे।50
हिन्दुओं और मुसलमनों में धनी वर्गों में अधिक पत्नियॉँ रखने की प्रथा थी। अलबरुनी के अनुसार “एक हिन्दू पुरुष एक से चार पत्नियाँॅ रख सकता है उसे इससे अधिक पत्नियाँॅ रखने की अनुमति नहीं है पर यदि इन चार पत्नियों में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है तो वह अपनी पत्नियों की वैध संख्या पुराने के लिए एक और विवाह कर सकता है। पर इसके ऊपर जाने की उसे अनुमति नहीं है।“ निकोलो कोन्टी कहता है कि मध्यभारत के निवासियों को केवल एक ही पत्नी रखने की अनुमति थी, पर भारत में फैले ईसाईयों को छोड़कर बहुविवाह की प्रथा सामान्य रुप से प्रचलित थी। विजयनगर साम्राज्य में राजपरिवार के लोग एवं नायक न केवल बहुविवाह करते थे अपितु रखैलों एवं नौकरानियों की बड़ी संख्या भी रखते थे। राजप्रासाद में रहने वाली इन महिलाओं में अनेक ज्योतिषी, भविष्यवक्ता संगीत एवं नृत्य-प्रवीण और राजा की अंग रक्षिकाएँ होती थी। मार्कोपोलो के अनुसार माबर राजा के पास पाँच सौ पत्नियाँ थीं। गुजरात राज्य की चर्चा करते हुए बारबोसा ने उद्धृत किया है कि ब्राह्यण एवं बनिया केवल एक ही लड़की से एक ही बार विवाह करते थे, फिर दूसरी बार विवाह नहीं करते थे।51
राजपूतों मे यह प्रथा आम थी। राजा जसवंत सिंह की अनेक पत्नियाँ और सात सौ रखेलिनें थीं। करेरी लिखता है कि चूँकि राजपूत स्वच्छंद राजा थे, उन्हें अपनी इच्छा के मुताबिक कितनी भी पत्नियाँ रखने की स्वतंत्रता थी। कालीकट के हिन्दू महिलाओं के संदर्भ में कहते हैं कि गैर मुस्लिम स्त्रियों में से किसी-किसी स्त्री को पाँच, छह और सात तक पति होते थे। असमिया कवि शंकरदेव ने श्रीमद्भागवत में बहुविवाह की चर्चा की है। एक प्रसंग में द्रौपदी को यह कहते हुए दिखाया गया है कि यदि उसे पॉँच पाण्डवों ने छोड़ दिया तो वह कृष्ण से विवाह कर लेगी। अलबरुनी के अनुसार सुदूर पार्वत्य प्रदेशों के हिन्दू परिवारों में बहुविवाह की प्रथा प्रचलित थी। पांचीर क्षेत्र से कश्मीर के समीपस्थ क्षेत्र तक बसे हुए लोगों में इस नियम के अधीन कई भाईयों की एक ही पत्नी होती थी।
मध्यकाल में हिन्दू राजा, मुगल बादशाह, सामंत और अमीर अपनी अय्याशियों को मूर्त रुप देने के लिए हरमों की स्थापना की थी। उनमें से कई तो अपनी दुर्दम्य यौनेच्छा की असफलता के कारण सुदर्शनाओं की नियमित आपूर्त्ति के लिए एक अलग ही विभाग रखे हुए थे। उस समय ‘हरम’ शब्द मुख्यतः उनकी कुल महिलाओं की संख्या का द्योतक था। अमीर खुसरो ‘देवलरानी-खिज्र खाँ’ में अलाउद्दीन खिलजी के हरम का मनोरंजक विवरण प्रस्तुत किया है। निकोलो कोन्टी और पेइज ने विजयनगर के राजा के हरम का विवरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि राजा के हरम में कुल मिलाकर 12 हजार महिलाएँ थी। सांभर के राजा बीसलदेव ने भी अनेक स्त्रियों से विवाह किए थे। उनके हरम में सबके बाद उनकी सबसे दुलारी पत्नी के रुप में धार के परमार राजा भोज की पुत्री राजमती ने प्रवेश पाया था। मुगल हरम के बारे में मनुची लिखता है कि चूँकि स्त्री ही मुसलमानों के मन बहलाव और मनोरंजन का प्रमुख साधन रही थी, इसलिए उन्होंने बड़े पैमाने पर खर्च कर जाति और धर्म का ख्याल किए बिना अपने हरम को दिलकश बनाने की कोशिश की। उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में अनुभवी महिलाओं को जासूसों के रूप में नियुक्त किया, जो उन्हें उनके साम्राज्य की सबसे आकर्षक युवतियों के बारे में सूचनाएँ पहँॅुचाती थी। अकबर के हरम में पाँच हजार से अधिक महिलाएँ थी। शाहजहाँ के स्त्री-प्रेम के बारें में मैनरीक लिखता है ‘‘लगता है कि शाहजहाँ को एक ही बात की परवाह थी और वह यह कि औरतों की खोज की जाय और उसके साथ ऐश किया जाय।’’52
हिन्दू विधि निर्माताओं का सुझाव है कि लड़कियों का विवाह अपरिवक्व वयस में किया जाना चाहिए ओैर वर एवं कन्या का चुनाव उसके माता-पिता द्वारा होना चाहिए। मध्यकाल में भी पुरानी परम्परा के अनुसार लड़के और लड़की के विवाह का समझौता पूरी तरह माता-पिता और उसके न रहने पर परिवार के वरिष्ठ सदस्य करते थे। माता-पिता अपने दामाद या वधुओं को चुनने में अधिक से अधिक संभव सावधानी बरतते थे। डुबोइस लिखता है कि जिसका विवाह हो रहा हो उससे कभी भी सलाह न ली जाती थी। वास्तव में ब्राह्मणों के बीच ऐसा हो सकना हास्यास्पद ही था क्योंकि वे अपनी लड़कियों का विवाह बहुत कम उम्र में ही कर देते थे। पर अपने लड़के-लड़कियों का विवाह उनकी उम्र हो जाने पर करने के प्रश्न पर शूद्र भी अपने लड़के-लड़कियों की रुचि या भावना के बारे में उनसे परामर्श लेने की बात स्वप्न में भी नहीं सोचते थे। सम्राट अकबर इस पक्ष में थे कि विवाह के मामले में लड़के एवं लड़कियों को कुछ रियायतें आवश्य मिलनी चाहिए। लड़का अपनी होनेवाली पत्नी को पहले से देख सके तो बादशाह का ख्याल है कि इस बारे में कन्या-वर की सहमति और उनके माता - पिता की अनुमति विवाह के करार में पक्के तौर पर जरुरी है। इतना ही नहीं अकबर ने विवाहों की जाँच-पड़ताल करने वाले दो आला अधिकारियों जिन्हें ‘ता-ई-देगी’ कहा जाता था, की नियुक्ति की ताकि वर-वधुओं के माता-पिता से उनकी हैसियत के मुताबिक कर लिया जा सके।53
मध्यकाल में हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदायों में बूढ़े व्यक्तियों का छोटी कन्याओं से तथा युवतियों का छोटे बच्चों से बेमेल विवाह की परम्परा व्यापक रूप से प्रचलित थी। हिन्दूओं में ऐसे विवाह धड़ल्ले से सम्पन्न किए जाते थे। उनका विचार था कि पत्नी की उम्र पति की उम्र की एक-तिहाई होनी चाहिए।54 आदर्श विवाह उसे माना जाता था जब कन्या वर के उम्र के एक तिहाई भाग के बराबर उम्र की होती थी अर्थात् 24 वर्ष के युवक का विवाह 8 वर्ष की उम्र्र की कन्या के साथ होनी चाहिए। 60 साल का विधुर 6-7 साल की बच्ची से भी विवाह कर लेता था। मनु के अनुसार “30 वर्ष का पुरुष 12 वर्ष की लड़की के साथ विवाह कर सकता है अथवा 24 वर्ष का युवक 8 वर्ष की लड़की से विवाह बना सकता है।“ मनु द्वारा विहित इस कानून ने हिन्दुओं में इस प्रथा को प्रोत्साहित किया होगा कि बूढ़ा व्यक्ति जवान औरतों से विवाह सम्बन्ध करे। लेकिन लड़कियों की प्रतिक्रिया थी कि बूढ़े से विवाह के बाद मृत्यु अपरिहार्य है। इनसे बूढ़े हतोत्साहित नहीं हुए अपितु उन्होंने लड़कियों के अभिभावकों के साथ मोलभाव करना शुरु कर दिया और काफी धन देकर शादियाँ बनाई। कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि कोई बच्चा युवती से विवाह सम्बन्ध कायम करता था। विद्यापति ने इस प्रकार के विवाह की चर्चा करते हुए उस युवती की पीड़ा को बड़ा ही कारुणिक अभिव्यक्ति दी है कि ‘पिया मोर बालक, हम तरुणी रे’। मेरा जीवन व्यर्थ है, क्योंकि मे पूर्णतः परिपक्व हूँ और मेरा पति एक अज्ञानी शिशु है। हो सकता है कि वह मेरे पूर्व जीवन के किसी दुष्कर्म का फल हो।‘‘
सजातीय एवं सगोत्रिय विवाह पर अत्यधिक बल दिए जाने के कारण मध्यकालीन समाज में दहेज प्रथा जोरों पर थी। पर इसे अमीर एवं समृद्धशाली व्यक्ति ही पसंद करते थे, सामान्य लोगों का इस प्रथा के प्रति कम ही रुझान था। दहेज की मात्रा सम्बद्ध पक्षों की आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा पर निर्भर करती थी। तत्कालीन समय में दहेज शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता था, एक विवाह के अवसर पर या उसके पूर्व लिया गया धन और दूसरा, विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद भेटों, उपहारों एवं चढ़ाई गई सामग्रियों के रूप में लिया गया धन। बंगाल और पाण्डय राज्य में दहेज की एक विचित्र प्रथा प्रचलित थी जिसमें वर पक्ष द्वारा वधूपक्ष को दहेज दिया जाता था। हो सकता है कि यह आदिवासियों में प्रचलित वधू-क्रय मूल्य का कोई अन्य प्रचलित तरीका हो। मार्कोपोलो ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है ‘‘यदि कोई व्यक्ति अपने से कम उम्र की लड़की से विवाह करता है तो उसे लड़की के माता-पिता को दहेज देना पड़ता है।’’
बिहार, बंगाल एवं उत्तरप्रदेश के निम्नत्तर वर्णों और उम्रदराज लोगों द्वारा विवाह के लिए वधुओं के क्रय की घटना आम थी। मनूची के अनुसार एक पति द्वारा पत्नी को खरीदने का तथ्य भी असमान्य नहीं है। अबुल फजल ब्राह्मणों में दहेजप्रथा होने से इंकार करता है। अकबर का विश्वास था कि ऊँचे दहेजों से हड़बडी में किए गये तलाकों पर प्रतिबंध लगता है। मुगल काल में दुल्हन के व्यक्तिगत गहने और उसके विवाह में भावी ससुर द्वारा दिए गए सभी सामग्रियों को एक दस्तावेज पर अंकित किया जाता था, वही कन्या की व्यक्तिगत सम्पिŸा मानी जाती थी। विधवा होने की स्थिति में वह उस पर अपने स्वामित्व का दावा कर सकती थी।
हिन्दुओं के विपरीत मुसलमानों में दहेज के बदले मेहर प्रथा का प्रचलन था। मेहर वह धन या सम्पत्ति है जो विवाह के प्रतिफल के रुप में पत्नी अपने पति से लेने की अधिकारी है। शरीअत के अनुसार मेहर पति का एक कर्त्तव्य जो पत्नी के प्रति पति के आदर का सूचक होता है। इसका मुख्य उद्देश्य पति पर पत्नी का तलाक देने सम्बन्धी नियंत्रण करना तथा पति की मृत्यु अथवा तलाक की स्थिति में महिला को अपने भरण - पोषण के योग्य बनाना था। मेहर की धनराशि विवाह के पहले या बाद में या फिर विवाह के समय निश्चित की जाती थी। यह धनराशि कम से कम 10 दरहम होनी चाहिए। इसे कम नहीं किया जा सकता था, लेकिन यदि पति चाहे तो वृद्धि की जा सकती थी। पत्नी चाहे तो इस धनराशि को घटा सकती थी, अपने पति को दे सकती थी या अपने उत्तराधिकारियों में बाँट सकती थी। मेहर की राशि मुख्यतः पति की आर्थिक स्थिति के ध्यान में रखकर तय की जाती थी। परवर्ती काल में मुसलमानों में भी हिन्दुओं के समान दहेजप्रथा का प्रचलन हो गया था।
अलबरुनी के अनुसार मध्यकाल में उच्चत्तर जातियों में न तलाक की सुविधा थी और न विवाहविच्छेद की। उनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाने पर ही वे एक-दूसरे से अलग हो सकते थे। फिर भी हिन्दुओं के बीच डोमों, चंडालो और शूद्रों में तलाक के नियम कायम थे। इस बात की पुष्टि मनूची ओर अबुल फजल दोनों करते है। मनूची के अनुसार “तलाक की प्रथा ब्राह्मण और राजपूत जातियों में भारत में कहीं नहीं पाई जाती है। उच्च जातियों में यदि कोई पत्नी परित्यक्ता हो जाती है तो वह पुनर्विवाह नहीं करती है जबकि छोटी जातियों में दोनों ही पक्ष पुनर्विवाह के लिए स्वतंत्र होते हैं।’’
मुस्लिम जगत में तलाक की प्रथा ‘खुला’ और ‘मुबारत’ नाम से प्रचलित थी। खुला तलाक में पहल पत्नी की ओर से होती थी, जबकि मुबारत में दोनों पक्षों में से कोई भी इसकी पहल कर सकता था। तलाक के पीछे कोई भी कारण हो सकता था। यदि पति यौन परिपक्वता प्राप्त करने के बाद चार माह तक यौन - सम्पर्क से अलग रहता है, पति या पत्नी पर व्याभिचार का आरोप लगने पर, तथा दो लगातार वर्षों तक पति द्वारा पत्नी का भरण - पोषण नहीं किए जाने पर। इसके अतिरिक्त पति नपुंसक हो, पागल हो, असाध्य बीमारी से ग्रसित हो, कैदी हो या क्रूर हो तो भी पत्नी तलाक ले सकती है। कुरान और हदीस में बतलाया गया है कि “पत्नी पर व्याभिचार का आरोप लगाकर पति तभी कोई कार्यवाही कर सकता है जब तक कि कम से कम चार गवाह इस बात की गवाही न दे दे कि उसकी पत्नी व्याभिचारिणी है।“ इसके अलावे पति के तंग करने पर भी पत्नी पति से तलाक की माँग कर सकती थी।
हिन्दुओं विशेषतः राजपूतों में पुत्रियों की हत्या बहुत सामान्य बात थीय क्योंकि राजपूतों एवं अन्य लडाकू जातियों में लड़की के जन्म को बड़ी अरुचि के साथ देखा जाता था। वे पुत्री के जन्म के समय ही किसी न किसी प्रकार से उसकी हत्या कर देते थे। इसका प्रमुख कारण यह था कि उनकी विशेष प्रथा के अनुसार उन्हें अपनी पुत्रियों के विवाह के अवसर पर बहुत खर्च करना पड़ता था। पत्नी के चुनाव में जाति के कड़े प्रावधानों के कारण भी पुत्री हत्या की प्रथा चल पड़ी थी। कन्या की विवाह की उम्र हो जाने के बाद भी उनके लिए योग्य पर ढ़ूँढ पाना मुश्किल हो जाता था। जाति प्रथा के निरर्थक क्रूरतापूर्ण नियमों के चलते वह स्वयं अपनी जाति या वंश में ब्याही नहीं जा सकती थी जबकि वर के चुनाव का क्षेत्र कृत्रिमतापूर्वक सीमित कर दिया गया था। फिर उन्हें अविवाहित भी नहीं रखा जा सकता था, क्योंकि इससे परिवार की काफी बदनामी होती थी। पारिवारिक आत्मसम्मान, धार्मिक अनुशासन और बदनामी से बचने की आवश्यकता के कारण यह असंभव सा हो गया था कि पुत्रियोंं की उम्र बढ़ने दी जाय और उन्हें अविवाहित रहने दिया जाय।
सम-सामयिक साहित्यिक कृतियों एवं विदेशियों के यात्रावृतांतों में ढेरों सतीप्रथा के उद्धरणों से स्पष्ट है कि मध्यकाल में सतीप्रथा का व्यापक प्रचलन था। अलबरुनी लिखता है कि यदि किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती थी तो वह किसी दूसरे पुरुष से विवाह नहीं करती थी या तो वह विधवा के रुप में जीवित रहती थी या मृत पति के साथ जल मरती थी। बाद वाले विकल्प यानी मृत पति के साथ जल मरने के विकल्प को आमतौर पर पसंद किया जाता था, क्योंकि विधवा जब तक जीवित रहती थी तब तक उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाता था। जहाँ तक राजाओं की पत्नियों का सवाल था, वे आदतन चाहे या न चाहे, अपने को मृत पति के साथ जला डालती थी। इसमें उनकी इच्छा होती थी कि वे ऐसा कोई अनैतिक काम न कर बैठे जिससे कि उसके विख्यात पति के नाम पर धब्बा लगे। इस नियम में अपवाद तभी किया जाता था जब विधवा की उम्र ज्यादा होती थी और उन विधवाओं के मामले में जिनके बच्चे होते थेय क्योंकि माँ बच्चे की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होती है। मनुची के अनुसार ‘‘पति की मृत्यु के बाद एक हिन्दू स्त्री के पास चार रास्ते होते थे या तो वह अपने पति के साथ जल मरे अथवा वेश्यावृत्ति को अपनाये या अपने माता-पिता के साथ रहे या पुनर्विवाह कर ले।“ इसमें दूसरा और चौथा रास्ता सामान्यतः नहीं अपनाया जाता था। परिवार के लिए यह बड़ी असम्मानजनक बात मानी जाती थी कि उसकी महिला सदस्यों में से कोई अपने पति की मृत्यु के बाद उसके साथ जल मरने के बजाय विधवा के रुप में ही रहना पसंद करती थी। यदि महिलायें अपने मृत पति की मृत्यु के बाद उसके साथ परलोक जाने से इंकार कर देती थी, तो उनसे उनकी सखियाँ नफ़रत करने लगती थी और उसे छोड़ देती थी, मानों वह समाज का कुड़ा-करकट और अशुद्धता की मुर्ति हे और उसके परिवार को सदैव के लिए निन्दा का पात्र बनना पड़ता था।
विजयनगर सामाज्य में सतीप्रथा के प्रचलन का साक्ष्य तत्कालीन अभिलेखों एवं विदेशी वृत्तांतों दोनों में उल्लेख मिलता है। विजयनगर के अभिलेखों में 1354 ई0 के एक अभिलेख में मालागौडा नामक एक महिला का अपने पति की मृत्यु के बाद सती या सहगमन करके स्वर्गारोहण का उल्लेख है। इस काल में स्त्रियों द्वारा अपने पति की मृत्यु के बाद सती होना मुक्ति का प्रतीक माना जाता था। विजयनगरकालीन अभिलेखों में सती या सहगमन के काफी मात्रा में संदर्भ प्राप्त होते है और लगभग समस्त विदेशी यात्रियों ने इस क्रूर प्रथा का बड़े विस्तार के साथ उल्लेख किया है। अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर यह अनुमान किया गया है कि यह प्रथा केवल नायकों एवं राजपरिवारों तक ही सीमित थी। डुआर्ट बारबोसा ने लिखा है कि यह प्रथा लिंगायतों, चेट्टियों ओर ब्राह्यणों में प्रचलित नहीं थी। सती होने वाली स्त्रियें की स्मृति में पाषाण स्मारक लगाये जाते थे। फिर भी यह प्रथा सैद्धान्तिक रुप से प्रचलित नहीं थी, यद्यपि इसे सम्माननीय समझा जाता था। सतीप्रथा के सम्बन्ध में राज्य का दृष्टिकोण तटस्थ नहीं था। विधवा विवाह करनेवाले युगल विवाह कर से मुक्त थे। अतः प्रतीत होता है कि राज्य व्यावहारिक दृष्टि से सतीप्रथा को प्रश्रय नहीं देता था।
राजपूताना में सतीप्रथा का प्रचलन बहुत ज्यादा था। अधिकांश राजपूत स्त्रियाँ अपने पति की चिता पर इच्छा या अनिच्छा से चढ़ जाती थी। औसतन हर राजपूत राजकुमारी सती होने के अवसर का स्वागत करती थी और मृत पति को अकेले न जलने देती थी। कर्नल टॉड लिखता है कि दूसरे देशों की स्त्रियें को राजस्थानी स्त्रियों का भाग्य भयभीत कर देनेवाली कठिनाईयें से भरा हुआ दिखाई देगा। जीवन के प्रत्येक चरण में मृत्यु उन्हें अंगीकार करने के लिए खड़ी है। जन्म के समय विष एवं युवा होने पर अग्नि की लपटें। उनका सुरक्षित जीवन युद्ध की अनिश्चितता पर आधारित है जो कभी भी बारह महीने से अधिक नहीं है। चूँकि राजपूत सरदार आदतन अनेक विवाह करते थे, इसलिए उनकी स्त्रियाँ बड़ी संख्या में पति के मरने के बाद बलिदान करती थी। इब्नबतूता ने ‘रेहला’ में आमीझरा (अमझौर) का उल्लेख किया है जहाँ उसने सामुहिक रुप से सतियों को अग्नि में प्रवेश करते हुए देखा था, ये महिलाएँ राठौड़ परिवार से सम्बन्ध रखती थी। मनुची लिखता है कि उसने राजपूत विधवाओं को अनेक बार अपने मृत पति के साथ जलते हुए देखा है। इसका बडा दल होता था जिसमें कभी - कभी एक साथ 15, 20 और यहाँ तक कि 30 विधवाएँ होती थी। यदि पति की एक से भिन्न जाति की एक से अधिक पत्नियाँ होती थी तो केवल पटरानी को ही मृत पति की चिता पर जलने की अनुमति दी जाती थी जबकि अन्य रानियाँ अलग - अलग चिताओं पर जलती थी। राजा जयसिंह की मृत्यु के बाद उसकी पटरानी सुरेन्द्रवती अन्य दो रानियों बेलावती और कृति के साथ चिता में प्रवेश कर गई थी। राजा रतनसिंह की मृत्यु के बाद पद्मावती एक अन्य रानी नागमति के साथ सहमरण द्वारा सती हुई थी। मृगावती में कुतुबन लिखते हैं कि राजकुँवर की मृत्यु के बाद मृगावती, रुक्मिणी और रनिवास की (84) चौरासी महिलाओं ने जलकर मृत्यु का वरण किया था। राजपूताना से प्राप्त सती सम्बन्धी शिलाओं और फलकों पर अंकित लेखों से स्पष्ट होता है कि राजपूतों द्वारा सती स्मारक बड़े पैमाने पर बनवाये जाते थे। मारवाड़ के महाराणा प्रताप, मालदेव, जसवंत सिंह, बीकानेर के राय सिंह अैर कोटा के भीमसिंह जैसे शासकों की रानियाँ अपने पति की चिता में भस्मीभूत हुई थी।
मुगल काल में सतीप्रथा कमोवेश बाध्यकारी सी हो गई थी। भूख, नफरत और परिवार की दासता की भयानक जिन्दगी बिताने के बजाय विधवायें अपने स्वर्गीय पति से पुनर्मिलन की आशा में उसके साथ जलकर कष्टपूर्ण मृत्यु को श्रेयस्कर मानती थी। इस तरह यह अस्वाभाविक नहीं था कि मध्यकालीन हिन्दू समाज में सतीप्रथा अत्यधिक सामान्य हो गई। अकबर के दरबार में आनेवाले फादर मांसेराट ने लिखा है कि हिन्दुओं के उच्चवर्ग की प्रसिद्ध जाति ब्राह्मणों की पत्नियॉँ अपने धर्म की प्राचीन परम्पराओं के अनुसार इसके लिए अभ्यस्त है कि अपने मृत पति की चिता पर उसी के साथ जल मरे। डेलावैले के अनुसार “भारत की स्त्रियाँ“ अपने पति को इतनी तीव्रता से प्यार करती है कि जब उसके पति की मृत्यु हो जाती है तो उसके साथ जल मरने का संकल्प करती है।“ इब्नबतूता, मनूची, पेलसर्ट, बर्नियर टैवरनियर तथा फोस्टर लगभग सभी तत्कालीन विदेशी यात्रियों ने अपने यात्रावृतांत में किसी न किसी रूप में सती प्रथा का वर्णन किया है।
सतीप्रथा का एक अन्य प्रारुप जो राजस्थान में प्रचलित था जिसे ‘‘जौहर प्रथा’’ कहा जाता थाय के अंतर्गत महिलाएॅँ अपने पति की मृत्यु का इंतजार किए बिना ही अपने जीवन का अंत कर देती थी। जौहर एवं सती में फर्क यह था कि जौहर मृत्यु की संभावना मात्र से ही चिता जलाकर मरने की प्रथा थी जबकि सती पति की मृत्यु के बाद सहमरण या अनुमरण विधि से आत्मदाह की प्रथा थी। जेम्स टॉड लिखता है कि राजपुतिनों का भाग्य भयानक कठिनाईयों का होता था। जीवन के हर चरण में मृत्यु उनको अपने आलिंगन में लेने के लिए तैयार थी। किसी युद्ध में उनके पति की पराजय या शत्रु द्वारा किसी नगर का घेरा, उन लोगों के लिए संकेत था कि वे गिरफ्तारी और उनके भयानक खतरों से, जो राजपुतिनों के लिए मृत्यु से भी बदतर था, यह प्रथा जौहर राजपूतों के अंतर्राष्ट्रीय युद्धों में सामान्य थी। जब राजपूत सरदार या उनके योद्धा किसी युद्ध अभियान में हारकर निराश हो जाते थे, वे अपने यहाँ की महिलाओं और बच्चों को मार डालते थे या उनको किसी भुमिगत घर के भीतर ताले में बंद कर उसमें आग लगा देते थे और फिर हाथ में तलवार लिए हुए वे अपनी निश्चित परन्तु शौयपूर्ण मृत्यु की ओर अग्रसर होते थे।
खिलजी सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने जब रणथम्भौर पर आक्रमण किया था तब वहाँ के राणा ने पहाड़ के शिखर पर आग लगा दी और अपने यहाँ की महिलाओं एवं बच्चों को उसमे फेंक दिया तथा अपने कुछ निष्ठावान समर्थकों को साथ लिए हुए शत्रु से भिड़ गया एवं साथियों के साथ जीवन होम कर दिया। काम्पिल्य के राय ने उस समय जौहर किया जब मुहम्मद बिन तुगलक अपने विद्रोही सरदार गुहतास्प को गिरफ्तार करने के लिए उसका किला घेरा था। इब्नबतूता के अनुसार “राय ने भीषण आग लगवाई और अपनी रानियों, अमीरों की पत्नियों तथा सारी सम्पत्ति को जला डाला, फिर हाथ मे बिना ढ़ाल लिए नंगी तलवार लेकर चुने हुए सरदारों के साथ सुल्तान की सेनाओं पर धावा बोल दिया और लड़ते-लड़ते मारा गया।“
उच्च उमरावर्ग की गणना शासक वर्ग में की जाती थी, जो सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन में शासकों का अनुकरण करते थे। शाही हरम की भाँति उनके यहाँ भी हरम होते थे, जहाँ उनकी पत्नियाँ, पुत्रियाँ, उपपत्नियाँ तथा अन्य महिलाएँ निवास करती थी। उमरावर्ग की स्त्रियों को सभी सुख एवं सुविधायें उपलब्ध थी। हिन्दू शासक वर्ग में स्वायत्त शासक, जमींदार, जागीरदार और राजपूत सरदार शामिल थे। इस वर्ग की स्त्रियों का जीवन मुस्लिम वर्ग की स्त्रियों की ही भाँति सुखमय एवं वैभवपूर्ण था। मध्यम वर्ग के अंतर्गत, शिक्षक, हकीम, ज्योतिषी, साधारण अमीर, मध्यम जमींदार, वेतनभोगी राजकीय कर्मचारी एवं व्यापारी आदि सम्मिलित थे। उच्चवर्ग की तुलना में मध्यवर्ग कम सम्पन्न था, परन्तु इस वर्ग की मुस्लिम एवं हिन्दू स्त्रियों की दशा लगभग समान थी तथा वे सुख एवं सुविधाओं का उपभोग करती। शिल्पकार कृषक एवं छोटे व्यवसायी वर्ग की स्त्रियों की दशा मध्यमवर्ग की स्त्रियों से निम्नŸार थी। इस वर्ग की मुस्लिम एवं हिन्दू स्त्रियाँ अपने पति के व्यवसायों में भी सहयोग देती थी। उन्हें एक ही साथ दो मोर्चों पर घर और बाहर काम करना पड़ता था, परन्तु उनकी दशा संतोषजनक थी। जहाँ तक निम्नवर्ग की निर्धन एवं निःसहाय स्त्रियों का प्रश्न है उनकी दशा दयनीय थी। वे उच्च एवं मध्यम वर्ग के परिवारों की सेवा करके अपना जीविकोपार्जन करती थी।
इस्लाम में मानव समानता को स्वीकार किया गया है तभी सभी मुसलमान को समान अधिकार दिए गये है। मुहम्मद साहब ने स्त्री पुरुष को समान स्वीकार किया। पवित्र कुरान में एक तरफ स्त्रियों की प्रशंसा की गई है तथा उसे परिवार में शिशु चरित्र के निर्माण के लिए उतरदायी स्वीकार किया गया है। वहीं दूसरी ओर कुरान कहता है कि पुत्र हमेशा पुत्री की तुलना में प्राथमिकता पाता है क्योंकि पुरुष स्त्रियों के निगराँ और जिम्मेदार है, इसलिए कि अल्लाह ने एक को दूसरे पर बड़ाई दी है। नेक स्त्रियाँ आज्ञापालन करनेवाली होती है। सरकश स्त्रियों को समझाओं, विस्तर पर उन्हें तन्हा छोड़ों और न मानने पर उन्हें पीटो। यह खुदा की ख्वाहिश है। अन्यत्र कहा गया है कि ‘‘पुरुष स्त्रियों से श्रेष्ठ है, पुरुष का हिस्सा दो स्त्रियों के बराबर है।
हिन्दूओं और मुसलमानों दोनां सम्प्रदायों में पुत्री के जन्म को दुभार्ग्यपूर्ण घटना माना जाता था। पुत्री के जन्म का ठंडा स्वागत किया जाता था । ऐसा रुख न केवल परिवार के पुरुष सदस्यों का ही नहीं होता था बल्कि बेटी की माँ और दादी का भी होता था। यदि हिन्दू महिलाएँ लगातार पुत्रियों को जन्म देती थी तो उसे प्रायश्चित करना पड़ता था। जेम्स टॉड के अनुसार जब परिवार में पुत्री का जन्म होता था तो न माँ से उस सम्बन्ध में उत्सुकतापूर्वक पूछ-ताछ की जाती थी और न ही नवजात शिशु का बधाईयों से स्वागत किया जाता था। पुत्री के जन्म पर बहुत कम खुशी होती थी क्योंकि पुत्रियाँ अपने पूर्वजों की शांति के लिए आवश्यक कार्यविधियाँ नहीं कर सकती थी और साथ ही उन्हें अनावश्यक खर्च का कारण माना जाता था। पुत्र की माँ का आदर किया जाता था जबकि उसे पुत्री होने पर भला-बुरा कहा जाता था। भारत में अवांछित पुत्री दया का पात्र होती थी। कुछ परिवारों में माता-पिता द्वारा उसे इसलिए डॉँटा-फटकारा जाता था कि वह लड़की है। यदि बच्चा शिशु हुआ तो माँ को इक्कीस दिन अस्वच्छ माना जाता था और अगर बच्ची हुई तो यह अवधि एक महीना और बढ़ा दी जाती थी। जाटों में एक विचित्र प्रथा का चलन था, उनके यहाँ पुत्र का जन्म होता था तो कहा जाता कि पुत्री का जन्म हुआ है। यदि कन्या का जन्म होता था, तो कहा जाता था कि एक पत्थर पैदा हुआ है।
मध्यकाल में हिन्दू स्त्रियों की अपेक्षा मुस्लिम महिलाओं को कुछ अधिक साम्पिŸाक अधिकार प्राप्त थे। कुरान में उल्लिखित है कि पुरुषों ने जो कुछ कमाया है, उसके अनुसार उनका हिस्सा है और महिलाओं ने जो कुछ कमाया है, वह उनकी सम्पति है। अल्लाह! तुम्हारी औलाद के बारें में तुम्हें वसीयत करता है कि पुरुषो का हिस्सा दो स्त्रियों के बराबर हो या दो से अधिक लड़कियाँ हो तो उनको हिस्सा उस रकम का छठा भाग है और यदि उनके औलाद न हो और उसके माता-पिता ही उसके वारिस हो तो उसके माता का हिस्सा तिहाई होगा। इस आयात से यह निदिर्ष्ट होता है कि लड़की का हिस्सा लड़के के आधा रखकर उसे कमतर समझा गया। फिर भी जहाँ हिन्दू समाज में महिलाओं को कोई अधिकार नहीं था उसकी अपेक्षा यह एक क्रांतिकारी कदम कहा जा सकता है। इस आयत में यह भी ध्यान रखा गया है कि शादी के बाद लड़की पति की सम्पत्ति में भी हकदार हेगी। सुर-अन-निसा की 12 वीं आयत पति को पत्नी की छोड़ी हुई सम्पत्ति का पूरी तरह मालिक नहीं बनाती। उसके अनुसार पत्नी को कोई औलाद नहीं है तो उसकी सम्पत्ति में पति का आधा भाग ही होगा और यदि कोई संतान है तो पति एक-चौथाई भाग का ही भागीदार होगा।
सम्पत्ति के उत्तराधिकार के विषय में हिन्दू स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं था। यद्यपि पुत्री के रूप में स्त्रियों का अपने पिता की सम्पत्ति में कोई भाग नहीं होता था फिर भी प्रत्येक अविवाहित पुत्री को अपने भाईयों को मिलने वाले पितृधन का एक - चौथाई भाग प्राप्त करने का अधिकार था। मृत्यु के पश्चात् माँ की सम्पत्ति पुत्रों एवं अविवाहित पुत्रियों में समान रुप से बाँटी जाती थी। विवाहित पुत्रियों को केवल सम्मान स्वरुप थोड़ा ही भाग मिलता था। 12 वीं सदी तक आते - आते सम्पूर्ण देश में विधवा के मृत पति का उत्तराधिकारी होने का सिद्वान्त व्यावहारिक रुप में स्वीकार कर लिया गया। स्त्री को स्वयं की सम्पत्ति जिसके ऊपर उसका पूरा अधिकार होता था वह स्त्रीधन था। इस समय तक स्त्रीधन का क्षेत्र व्यापक करके उसमें उत्तराधिकार एवं विभाजन की सम्पत्ति को भी सम्मिलित कर लिया गया।
मध्यकाल में स्त्रियों की शिक्षा की प्रगति शासकों एवं समृद्ध लोगों के संरक्षण में धीमी गति से हुई । शासकों एवं अन्य शिक्षाप्रेमी व्यक्तियों ने महिला शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास किया। हिन्दू और मुस्लिम स्त्रियों ने धार्मिक और उच्च प्रकार की साहित्यिक कृतियों में रूचि ली। इन सबके बावजूद विदूषी हिन्दू स्त्रियों का अभाव ही रहा। जिसका प्रमुख कारण पर्दाप्रथा और बाल विवाह था। इसका अर्थ यह नहीं है कि उस समय अच्छे शैक्षिक संस्थान पर्याप्त मात्रा में नहीं थे। सच पूछा जाय तो उनकी शिक्षा की उपेक्षा की जाती थी। इब्नबतूता हनौर के शासक को महान शिक्षाप्रेमी बताते हुए कहता है कि हनौर की सारी महिलाओं ने कुरान रट डाला था, वहाँ लड़कों के लिए 23 और लड़कियों के लिए 13 विद्यालय स्थापित थे। वाकियात-इ-मुस्तौकी का लेखक शेख रिजकुल्ला लिखता है कि इस अवधि में शिक्षा की स्वच्छ धारा पूर्वकाल की तरह ही प्रवाहित हो रही थी। स्त्रियों को सामान्य पाठ्यक्रम के अनुसार ही पढ़ाया जा रहा था तथा साथ ही उन्हें विभिन्न कलाओं और विज्ञानों की भी शिक्षा दी जाती थी।
सामान्यतः शासक और उच्चवर्गां के लोग अपनी पुत्रियों और बहनों को शासनकार्य में प्रशिक्षित करते थे। जब कभी आवश्यक होता था तो वे शिक्षा की स्वयं देख-रेख करते थे और प्रशिक्षण के लिए विशिष्ट एवं सामान्य जन के लिए दुर्लभ शिक्षा के निपुण और विद्वान शिक्षकों को नियुक्त करते थे। ऐसी स्थिति के उनलोगों के लिए यह शोभा की बात नहीं थी कि विभिन्न परिवारों की स्त्रियों के लिए शिक्षा की कोई व्यवस्था न थी तथा लड़को की तुलना में लड़कियों की शिक्षा की सुविधाएँ नगण्य थी। इसका एक कारण यह था कि स्वयं लड़कियों के अभिभावक स्त्री शिक्षा के प्रति अनमनयस्क थे और प्रगतिशील एवं व्यापक से व्यापकतर होती जानेवाली स्त्रीशिक्षा के मार्ग में उनके सामाजिक बाध्यताएँ एवं पूर्वाग्रह वास्तविक बाधक थे। पर्दाप्रथा एक ऐसी ही सामाजिक बाध्यता थी जिसके अधीन स्त्रियों को घर की चाहरदीवारी के अंदर बंद रहना पड़ता था। सुसंस्कृत और उच्चवर्गों की हिन्दू एवं मुस्लिम महिलाएँ बाहरी आदमियों और अपने ही परिवार के बुर्जुग सदस्यों के समक्ष नहीं आ सकती थी। इस सामाजिक बाध्यता के कारण स्त्रियों की शिक्षा के लिए इच्छुक अभिभावक भी खुद अपने परिवार की स्त्रियों को सर्वांगपूर्ण शिक्षा देने से वंचित रहते थे। इसलिए स्वभावतः प्रचलित सामाजिक परम्पराओं के कारण उनकी बौद्धिक क्षमताएँ विकसित नहीं हो पाती थी।
बालविवाह हिन्दू एवं मुस्लिम सम्प्रदायों में महिला शिक्षा के लिए एक बड़ी बाधा थी क्योंकि विवाह के बाद लड़कियों को शिक्षा का अवसर ही नहीं मिल पाता था। ऐसे अस्वस्थ्यकर सामाजिक परिवेश में मध्य आयुवाली महिलाओं को साक्षरता की उत्कृष्ट उपलब्धियों तक पहुँच पाना असंभव था। सामुहिक निरक्षरता के कारण समाज उपर्युक्त बुराईयों में जकड़ा हुआ था। गाँववालों और निचले वर्गों की महिलाओं को तो शिक्षा प्राप्त करने में और भी असुविधायें थी। वे घरेलू काम-काज के बोझ से इतनी दुःखी होती थी कि उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का अवसर ही नहीं मिल पाता था।
मध्यकाल में व्यापक स्तर पर स्त्रीशिक्षा व्यवहारतः एक अनजानी चीज थी। शिक्षा केवल शाही और अभिजात वर्गो की महिलाओं तक ही सीमित थी। कुछ हद तक समाज के मध्यवर्ग की स्त्रियाँ भी शिक्षा पा जाती थीय पर जहाँ तक निर्धन एवं निचले वर्गों की महिलाओं का सम्बन्ध था, वे अपना पेट पालने में ही बूरी तरह व्यस्त रहती थी और बौद्धिक प्रशिक्षण के लिए समय न निकाल पाती थी। हिन्दू महिलाओं को सुसंस्कृत बनाने के प्रति ध्यान न देते थे। फलतः लड़कियॉँ निरक्षरता में पलने-बढ़ने को बाध्य थी जो भी थोड़ी बहुत बौद्धिक शिक्षा उन्हें मिल पाती थी वह भी अपनी मॉ से। वह शिक्षा अनेक विषयों के सम्बन्ध में होती थी और मौखिक रूप से दी जाती थी।45 प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद विशेषकर मध्यवर्ग की हिन्दू लड़कियों को अपनी पढ़ाई आगे बढ़ाने की बहुत कम सुविधायें मिल पाती थी। यद्यपि उच्चवर्गों की कुछ महिलायें राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में अतीव सक्रिय और साहित्यिक कार्यकलाप में पूर्णतः निपुण थी, पर सामान्य परिवार की लड़कियाँ अधिकांशतः अशिक्षित ही रह जाती थी।46
हिन्दू समाज में पर्दाप्रथा का व्यापक प्रचलन मुस्लिम आक्रमण के प्रभाव से हुआ था। मुस्लिम समाज में पर्दा का पालन कड़ाई से किया जाता था। पर्दा एक इस्लामी शब्द है जो अरबी भाषा से आया है। इसका अर्थ है ढ़कना या अलग करना। पर्दा का एक पहलू है बुर्का का चलन। बुर्का एक तरह का घुॅँघट है जो मुस्लिम समुदाय की महिलायें और लड़कियॉँ कुछ खास जगहों पर खुद को पुरुषों की निगाह से दूर रखने के लिए इस्तेमाल में लाती थी। भारत में हिन्दूओं में पर्दाप्रथा इस्लाम की देन है। इस्लाम के प्रभाव से तथा इस्लामी आक्रमण के समय हिन्दू स्त्रियाँ भी पर्दा करने लगी थी। एन0 एम0 जफ्फार ने पर्दा को हिन्दू स्त्रियों के लिए धार्मिक कत्तर्व्य बताया है। धार्मिक ग्रंथों के उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाने का प्रयास किया है कि पर्दा त्यागना हिन्दू समाज में निन्दनीय समझा जाता था। हिन्दू समाज में पर्दा का पालन अनिवार्य रुप से होता था।
मुसलमानों के आगमन से पूर्व भारत में पर्दा प्रथा का अभाव था। हिन्दू स्त्रियॉँ केवल घूॅँघट के द्वारा ही अपने मुॅँह ढँका करती थी। किन्तु मुसलमानों के आगमन के पश्चात् उनकी संस्कृति के प्रभावस्वरुप पर्दाप्रथा को विशेष बल मिला और मुसलमानों की भाँॅति हिन्दुओं में भी पर्दाप्रथा पहले की अपेक्षा कठोर हो गई । कुछ मुस्लिम शासकां ने कट्टरपंथी नीति के कारण पर्दाप्रथा को बढ़ावा दिया । तो कुछ ऐसी महिलाएँ हुई जिन्हांने इसे चुनौती पेश की। रजिया सुल्तान शायद पहली मुस्लिम महिला थी जिसने लालवस्त्र पहनकर चाँदनी चौक में जनता के सम्मुख बिना पर्दे के खड़ी हुई और सुल्तान के विरुद्व बगावत करते हुए न्याय की मॉँग की थी। बाद में दिल्ली का सुल्तान बनने के बाद वह पुरुषवेश में आवरणहीन चेहरे के साथ शाही िंसंहासन पर आसीन होती थी और सरदारों के बीच बेखौफ होकर आती जाती थी। दूसरी ओर सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने पर्दाप्रथा के प्रचार के लिए राज्य की ओर से प्रोत्साहन प्रदान किया था। वह पहला सुल्तान था जिसने मुस्लिम औरतों को दिल्ली के बाहर स्थित मजारों पर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था अतः अमीरो की स्त्रियों ने डोलियों अथवा पालकियों में निकलना बंद कर दिया था। उदारवादी प्रवृति का सम्राट होने के बावजूद अकबर ने पर्दाप्रथा का समर्थन किया था। बदायूॅँनी के अनुसार यदि कोई युवती बिना बुरका अथवा बिना परदा किए सड़कों एवं बाजारों में घूमती हुई पाई जाती थी तो उसको वेश्यालय भेज दिया जाता था जहाँॅ वह वेश्या के पेशे को ग्रहण कर लिया करती थी। नूरजहाँॅ ने पर्दा प्रथा को नकारते हुए अपने पति के साथ खुले दरबार में हाजिर होती थी तथा पति की उपस्थित में अमीरों को आदेश दिया करती थी। मध्यकालीन भारत में पर्दा का इतनी कड़ाई से पालन होता था कि उदारवादी विचार रखनेवाले अमीर खुशरो ने भी; जिसने ‘लैला मजनूँ’ नामक अपनी कृति में इसका विरोध करते हुए इसकी बुराईयों का उल्लेख किया था; स्वयं अपनी पुत्री को इस बात का आदेश दे रखा था कि वह अपनी पीठ दरवाजे की ओर और मुँह दीवार की ओर करके बैठे ताकि कोई उसे देख न सके।
उच्चवर्ग के हिन्दुओं ने भी अपनी रक्त शुद्धता को बनाये रखने के लिए पर्दा का कठोरता से पालन किया। इस वर्ग में पर्दा सम्मान का माप रहा है जितनी ऊँची समाज में स्थिति रहेगी, स्त्रियॉँ उतनी ही अलग होगी। राजा और अमीर उमरा अपनी स्त्रियों के लिए पूर्णतः ढँॅकी और ताला लगी डोलियों का उपयोग करते थे। पर्दाप्रथा का कठोरता से पालन इस कदर बढ़ गया था कि उच्चवर्ग की बीमार स्त्रियों को हकीम या वैद्य भी नहीं देख सकते थे। उनकी बीमारी का पता उनके शरीर के कपड़ों से लगाया जाता था। यदि किसी स्त्री द्वारा पर्दा का कड़ाई से पालन नहीं किया जाता तो उसका पति तत्काल उसे तलाक दे देता था। हिन्दू अमीर भी मुस्लिम शासकों के तौर-तरीके अपनाने में संकेच नहीं करते थे क्योंकि उससे सामाजिक रुतवे में अभिवृद्धि होती थी।49 मुख्यतया आर्थिक कारणों से समाज की निम्न जातियों की स्त्रियों को पर्दे में नहीं रहना पड़ता था। कृषक स्त्रियों का विशाल समुदाय कोई चादर या विशेष रूप से बना परदा या बुर्का नहीं पहनता था और अलग-थलग नहीं रहता था। उसके हाँथ-पाँव और चेहरे खुले रहते थे। भारतीय किसान अधिक पत्नियाँ रखने का व्यय भी नहीं कर सकते थे।50
हिन्दुओं और मुसलमनों में धनी वर्गों में अधिक पत्नियॉँ रखने की प्रथा थी। अलबरुनी के अनुसार “एक हिन्दू पुरुष एक से चार पत्नियाँॅ रख सकता है उसे इससे अधिक पत्नियाँॅ रखने की अनुमति नहीं है पर यदि इन चार पत्नियों में से किसी एक की मृत्यु हो जाती है तो वह अपनी पत्नियों की वैध संख्या पुराने के लिए एक और विवाह कर सकता है। पर इसके ऊपर जाने की उसे अनुमति नहीं है।“ निकोलो कोन्टी कहता है कि मध्यभारत के निवासियों को केवल एक ही पत्नी रखने की अनुमति थी, पर भारत में फैले ईसाईयों को छोड़कर बहुविवाह की प्रथा सामान्य रुप से प्रचलित थी। विजयनगर साम्राज्य में राजपरिवार के लोग एवं नायक न केवल बहुविवाह करते थे अपितु रखैलों एवं नौकरानियों की बड़ी संख्या भी रखते थे। राजप्रासाद में रहने वाली इन महिलाओं में अनेक ज्योतिषी, भविष्यवक्ता संगीत एवं नृत्य-प्रवीण और राजा की अंग रक्षिकाएँ होती थी। मार्कोपोलो के अनुसार माबर राजा के पास पाँच सौ पत्नियाँ थीं। गुजरात राज्य की चर्चा करते हुए बारबोसा ने उद्धृत किया है कि ब्राह्यण एवं बनिया केवल एक ही लड़की से एक ही बार विवाह करते थे, फिर दूसरी बार विवाह नहीं करते थे।51
राजपूतों मे यह प्रथा आम थी। राजा जसवंत सिंह की अनेक पत्नियाँ और सात सौ रखेलिनें थीं। करेरी लिखता है कि चूँकि राजपूत स्वच्छंद राजा थे, उन्हें अपनी इच्छा के मुताबिक कितनी भी पत्नियाँ रखने की स्वतंत्रता थी। कालीकट के हिन्दू महिलाओं के संदर्भ में कहते हैं कि गैर मुस्लिम स्त्रियों में से किसी-किसी स्त्री को पाँच, छह और सात तक पति होते थे। असमिया कवि शंकरदेव ने श्रीमद्भागवत में बहुविवाह की चर्चा की है। एक प्रसंग में द्रौपदी को यह कहते हुए दिखाया गया है कि यदि उसे पॉँच पाण्डवों ने छोड़ दिया तो वह कृष्ण से विवाह कर लेगी। अलबरुनी के अनुसार सुदूर पार्वत्य प्रदेशों के हिन्दू परिवारों में बहुविवाह की प्रथा प्रचलित थी। पांचीर क्षेत्र से कश्मीर के समीपस्थ क्षेत्र तक बसे हुए लोगों में इस नियम के अधीन कई भाईयों की एक ही पत्नी होती थी।
मध्यकाल में हिन्दू राजा, मुगल बादशाह, सामंत और अमीर अपनी अय्याशियों को मूर्त रुप देने के लिए हरमों की स्थापना की थी। उनमें से कई तो अपनी दुर्दम्य यौनेच्छा की असफलता के कारण सुदर्शनाओं की नियमित आपूर्त्ति के लिए एक अलग ही विभाग रखे हुए थे। उस समय ‘हरम’ शब्द मुख्यतः उनकी कुल महिलाओं की संख्या का द्योतक था। अमीर खुसरो ‘देवलरानी-खिज्र खाँ’ में अलाउद्दीन खिलजी के हरम का मनोरंजक विवरण प्रस्तुत किया है। निकोलो कोन्टी और पेइज ने विजयनगर के राजा के हरम का विवरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि राजा के हरम में कुल मिलाकर 12 हजार महिलाएँ थी। सांभर के राजा बीसलदेव ने भी अनेक स्त्रियों से विवाह किए थे। उनके हरम में सबके बाद उनकी सबसे दुलारी पत्नी के रुप में धार के परमार राजा भोज की पुत्री राजमती ने प्रवेश पाया था। मुगल हरम के बारे में मनुची लिखता है कि चूँकि स्त्री ही मुसलमानों के मन बहलाव और मनोरंजन का प्रमुख साधन रही थी, इसलिए उन्होंने बड़े पैमाने पर खर्च कर जाति और धर्म का ख्याल किए बिना अपने हरम को दिलकश बनाने की कोशिश की। उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में अनुभवी महिलाओं को जासूसों के रूप में नियुक्त किया, जो उन्हें उनके साम्राज्य की सबसे आकर्षक युवतियों के बारे में सूचनाएँ पहँॅुचाती थी। अकबर के हरम में पाँच हजार से अधिक महिलाएँ थी। शाहजहाँ के स्त्री-प्रेम के बारें में मैनरीक लिखता है ‘‘लगता है कि शाहजहाँ को एक ही बात की परवाह थी और वह यह कि औरतों की खोज की जाय और उसके साथ ऐश किया जाय।’’52
हिन्दू विधि निर्माताओं का सुझाव है कि लड़कियों का विवाह अपरिवक्व वयस में किया जाना चाहिए ओैर वर एवं कन्या का चुनाव उसके माता-पिता द्वारा होना चाहिए। मध्यकाल में भी पुरानी परम्परा के अनुसार लड़के और लड़की के विवाह का समझौता पूरी तरह माता-पिता और उसके न रहने पर परिवार के वरिष्ठ सदस्य करते थे। माता-पिता अपने दामाद या वधुओं को चुनने में अधिक से अधिक संभव सावधानी बरतते थे। डुबोइस लिखता है कि जिसका विवाह हो रहा हो उससे कभी भी सलाह न ली जाती थी। वास्तव में ब्राह्मणों के बीच ऐसा हो सकना हास्यास्पद ही था क्योंकि वे अपनी लड़कियों का विवाह बहुत कम उम्र में ही कर देते थे। पर अपने लड़के-लड़कियों का विवाह उनकी उम्र हो जाने पर करने के प्रश्न पर शूद्र भी अपने लड़के-लड़कियों की रुचि या भावना के बारे में उनसे परामर्श लेने की बात स्वप्न में भी नहीं सोचते थे। सम्राट अकबर इस पक्ष में थे कि विवाह के मामले में लड़के एवं लड़कियों को कुछ रियायतें आवश्य मिलनी चाहिए। लड़का अपनी होनेवाली पत्नी को पहले से देख सके तो बादशाह का ख्याल है कि इस बारे में कन्या-वर की सहमति और उनके माता - पिता की अनुमति विवाह के करार में पक्के तौर पर जरुरी है। इतना ही नहीं अकबर ने विवाहों की जाँच-पड़ताल करने वाले दो आला अधिकारियों जिन्हें ‘ता-ई-देगी’ कहा जाता था, की नियुक्ति की ताकि वर-वधुओं के माता-पिता से उनकी हैसियत के मुताबिक कर लिया जा सके।53
मध्यकाल में हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदायों में बूढ़े व्यक्तियों का छोटी कन्याओं से तथा युवतियों का छोटे बच्चों से बेमेल विवाह की परम्परा व्यापक रूप से प्रचलित थी। हिन्दूओं में ऐसे विवाह धड़ल्ले से सम्पन्न किए जाते थे। उनका विचार था कि पत्नी की उम्र पति की उम्र की एक-तिहाई होनी चाहिए।54 आदर्श विवाह उसे माना जाता था जब कन्या वर के उम्र के एक तिहाई भाग के बराबर उम्र की होती थी अर्थात् 24 वर्ष के युवक का विवाह 8 वर्ष की उम्र्र की कन्या के साथ होनी चाहिए। 60 साल का विधुर 6-7 साल की बच्ची से भी विवाह कर लेता था। मनु के अनुसार “30 वर्ष का पुरुष 12 वर्ष की लड़की के साथ विवाह कर सकता है अथवा 24 वर्ष का युवक 8 वर्ष की लड़की से विवाह बना सकता है।“ मनु द्वारा विहित इस कानून ने हिन्दुओं में इस प्रथा को प्रोत्साहित किया होगा कि बूढ़ा व्यक्ति जवान औरतों से विवाह सम्बन्ध करे। लेकिन लड़कियों की प्रतिक्रिया थी कि बूढ़े से विवाह के बाद मृत्यु अपरिहार्य है। इनसे बूढ़े हतोत्साहित नहीं हुए अपितु उन्होंने लड़कियों के अभिभावकों के साथ मोलभाव करना शुरु कर दिया और काफी धन देकर शादियाँ बनाई। कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि कोई बच्चा युवती से विवाह सम्बन्ध कायम करता था। विद्यापति ने इस प्रकार के विवाह की चर्चा करते हुए उस युवती की पीड़ा को बड़ा ही कारुणिक अभिव्यक्ति दी है कि ‘पिया मोर बालक, हम तरुणी रे’। मेरा जीवन व्यर्थ है, क्योंकि मे पूर्णतः परिपक्व हूँ और मेरा पति एक अज्ञानी शिशु है। हो सकता है कि वह मेरे पूर्व जीवन के किसी दुष्कर्म का फल हो।‘‘
सजातीय एवं सगोत्रिय विवाह पर अत्यधिक बल दिए जाने के कारण मध्यकालीन समाज में दहेज प्रथा जोरों पर थी। पर इसे अमीर एवं समृद्धशाली व्यक्ति ही पसंद करते थे, सामान्य लोगों का इस प्रथा के प्रति कम ही रुझान था। दहेज की मात्रा सम्बद्ध पक्षों की आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा पर निर्भर करती थी। तत्कालीन समय में दहेज शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता था, एक विवाह के अवसर पर या उसके पूर्व लिया गया धन और दूसरा, विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद भेटों, उपहारों एवं चढ़ाई गई सामग्रियों के रूप में लिया गया धन। बंगाल और पाण्डय राज्य में दहेज की एक विचित्र प्रथा प्रचलित थी जिसमें वर पक्ष द्वारा वधूपक्ष को दहेज दिया जाता था। हो सकता है कि यह आदिवासियों में प्रचलित वधू-क्रय मूल्य का कोई अन्य प्रचलित तरीका हो। मार्कोपोलो ने इसका वर्णन करते हुए लिखा है ‘‘यदि कोई व्यक्ति अपने से कम उम्र की लड़की से विवाह करता है तो उसे लड़की के माता-पिता को दहेज देना पड़ता है।’’
बिहार, बंगाल एवं उत्तरप्रदेश के निम्नत्तर वर्णों और उम्रदराज लोगों द्वारा विवाह के लिए वधुओं के क्रय की घटना आम थी। मनूची के अनुसार एक पति द्वारा पत्नी को खरीदने का तथ्य भी असमान्य नहीं है। अबुल फजल ब्राह्मणों में दहेजप्रथा होने से इंकार करता है। अकबर का विश्वास था कि ऊँचे दहेजों से हड़बडी में किए गये तलाकों पर प्रतिबंध लगता है। मुगल काल में दुल्हन के व्यक्तिगत गहने और उसके विवाह में भावी ससुर द्वारा दिए गए सभी सामग्रियों को एक दस्तावेज पर अंकित किया जाता था, वही कन्या की व्यक्तिगत सम्पिŸा मानी जाती थी। विधवा होने की स्थिति में वह उस पर अपने स्वामित्व का दावा कर सकती थी।
हिन्दुओं के विपरीत मुसलमानों में दहेज के बदले मेहर प्रथा का प्रचलन था। मेहर वह धन या सम्पत्ति है जो विवाह के प्रतिफल के रुप में पत्नी अपने पति से लेने की अधिकारी है। शरीअत के अनुसार मेहर पति का एक कर्त्तव्य जो पत्नी के प्रति पति के आदर का सूचक होता है। इसका मुख्य उद्देश्य पति पर पत्नी का तलाक देने सम्बन्धी नियंत्रण करना तथा पति की मृत्यु अथवा तलाक की स्थिति में महिला को अपने भरण - पोषण के योग्य बनाना था। मेहर की धनराशि विवाह के पहले या बाद में या फिर विवाह के समय निश्चित की जाती थी। यह धनराशि कम से कम 10 दरहम होनी चाहिए। इसे कम नहीं किया जा सकता था, लेकिन यदि पति चाहे तो वृद्धि की जा सकती थी। पत्नी चाहे तो इस धनराशि को घटा सकती थी, अपने पति को दे सकती थी या अपने उत्तराधिकारियों में बाँट सकती थी। मेहर की राशि मुख्यतः पति की आर्थिक स्थिति के ध्यान में रखकर तय की जाती थी। परवर्ती काल में मुसलमानों में भी हिन्दुओं के समान दहेजप्रथा का प्रचलन हो गया था।
अलबरुनी के अनुसार मध्यकाल में उच्चत्तर जातियों में न तलाक की सुविधा थी और न विवाहविच्छेद की। उनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाने पर ही वे एक-दूसरे से अलग हो सकते थे। फिर भी हिन्दुओं के बीच डोमों, चंडालो और शूद्रों में तलाक के नियम कायम थे। इस बात की पुष्टि मनूची ओर अबुल फजल दोनों करते है। मनूची के अनुसार “तलाक की प्रथा ब्राह्मण और राजपूत जातियों में भारत में कहीं नहीं पाई जाती है। उच्च जातियों में यदि कोई पत्नी परित्यक्ता हो जाती है तो वह पुनर्विवाह नहीं करती है जबकि छोटी जातियों में दोनों ही पक्ष पुनर्विवाह के लिए स्वतंत्र होते हैं।’’
मुस्लिम जगत में तलाक की प्रथा ‘खुला’ और ‘मुबारत’ नाम से प्रचलित थी। खुला तलाक में पहल पत्नी की ओर से होती थी, जबकि मुबारत में दोनों पक्षों में से कोई भी इसकी पहल कर सकता था। तलाक के पीछे कोई भी कारण हो सकता था। यदि पति यौन परिपक्वता प्राप्त करने के बाद चार माह तक यौन - सम्पर्क से अलग रहता है, पति या पत्नी पर व्याभिचार का आरोप लगने पर, तथा दो लगातार वर्षों तक पति द्वारा पत्नी का भरण - पोषण नहीं किए जाने पर। इसके अतिरिक्त पति नपुंसक हो, पागल हो, असाध्य बीमारी से ग्रसित हो, कैदी हो या क्रूर हो तो भी पत्नी तलाक ले सकती है। कुरान और हदीस में बतलाया गया है कि “पत्नी पर व्याभिचार का आरोप लगाकर पति तभी कोई कार्यवाही कर सकता है जब तक कि कम से कम चार गवाह इस बात की गवाही न दे दे कि उसकी पत्नी व्याभिचारिणी है।“ इसके अलावे पति के तंग करने पर भी पत्नी पति से तलाक की माँग कर सकती थी।
हिन्दुओं विशेषतः राजपूतों में पुत्रियों की हत्या बहुत सामान्य बात थीय क्योंकि राजपूतों एवं अन्य लडाकू जातियों में लड़की के जन्म को बड़ी अरुचि के साथ देखा जाता था। वे पुत्री के जन्म के समय ही किसी न किसी प्रकार से उसकी हत्या कर देते थे। इसका प्रमुख कारण यह था कि उनकी विशेष प्रथा के अनुसार उन्हें अपनी पुत्रियों के विवाह के अवसर पर बहुत खर्च करना पड़ता था। पत्नी के चुनाव में जाति के कड़े प्रावधानों के कारण भी पुत्री हत्या की प्रथा चल पड़ी थी। कन्या की विवाह की उम्र हो जाने के बाद भी उनके लिए योग्य पर ढ़ूँढ पाना मुश्किल हो जाता था। जाति प्रथा के निरर्थक क्रूरतापूर्ण नियमों के चलते वह स्वयं अपनी जाति या वंश में ब्याही नहीं जा सकती थी जबकि वर के चुनाव का क्षेत्र कृत्रिमतापूर्वक सीमित कर दिया गया था। फिर उन्हें अविवाहित भी नहीं रखा जा सकता था, क्योंकि इससे परिवार की काफी बदनामी होती थी। पारिवारिक आत्मसम्मान, धार्मिक अनुशासन और बदनामी से बचने की आवश्यकता के कारण यह असंभव सा हो गया था कि पुत्रियोंं की उम्र बढ़ने दी जाय और उन्हें अविवाहित रहने दिया जाय।
सम-सामयिक साहित्यिक कृतियों एवं विदेशियों के यात्रावृतांतों में ढेरों सतीप्रथा के उद्धरणों से स्पष्ट है कि मध्यकाल में सतीप्रथा का व्यापक प्रचलन था। अलबरुनी लिखता है कि यदि किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती थी तो वह किसी दूसरे पुरुष से विवाह नहीं करती थी या तो वह विधवा के रुप में जीवित रहती थी या मृत पति के साथ जल मरती थी। बाद वाले विकल्प यानी मृत पति के साथ जल मरने के विकल्प को आमतौर पर पसंद किया जाता था, क्योंकि विधवा जब तक जीवित रहती थी तब तक उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाता था। जहाँ तक राजाओं की पत्नियों का सवाल था, वे आदतन चाहे या न चाहे, अपने को मृत पति के साथ जला डालती थी। इसमें उनकी इच्छा होती थी कि वे ऐसा कोई अनैतिक काम न कर बैठे जिससे कि उसके विख्यात पति के नाम पर धब्बा लगे। इस नियम में अपवाद तभी किया जाता था जब विधवा की उम्र ज्यादा होती थी और उन विधवाओं के मामले में जिनके बच्चे होते थेय क्योंकि माँ बच्चे की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार होती है। मनुची के अनुसार ‘‘पति की मृत्यु के बाद एक हिन्दू स्त्री के पास चार रास्ते होते थे या तो वह अपने पति के साथ जल मरे अथवा वेश्यावृत्ति को अपनाये या अपने माता-पिता के साथ रहे या पुनर्विवाह कर ले।“ इसमें दूसरा और चौथा रास्ता सामान्यतः नहीं अपनाया जाता था। परिवार के लिए यह बड़ी असम्मानजनक बात मानी जाती थी कि उसकी महिला सदस्यों में से कोई अपने पति की मृत्यु के बाद उसके साथ जल मरने के बजाय विधवा के रुप में ही रहना पसंद करती थी। यदि महिलायें अपने मृत पति की मृत्यु के बाद उसके साथ परलोक जाने से इंकार कर देती थी, तो उनसे उनकी सखियाँ नफ़रत करने लगती थी और उसे छोड़ देती थी, मानों वह समाज का कुड़ा-करकट और अशुद्धता की मुर्ति हे और उसके परिवार को सदैव के लिए निन्दा का पात्र बनना पड़ता था।
विजयनगर सामाज्य में सतीप्रथा के प्रचलन का साक्ष्य तत्कालीन अभिलेखों एवं विदेशी वृत्तांतों दोनों में उल्लेख मिलता है। विजयनगर के अभिलेखों में 1354 ई0 के एक अभिलेख में मालागौडा नामक एक महिला का अपने पति की मृत्यु के बाद सती या सहगमन करके स्वर्गारोहण का उल्लेख है। इस काल में स्त्रियों द्वारा अपने पति की मृत्यु के बाद सती होना मुक्ति का प्रतीक माना जाता था। विजयनगरकालीन अभिलेखों में सती या सहगमन के काफी मात्रा में संदर्भ प्राप्त होते है और लगभग समस्त विदेशी यात्रियों ने इस क्रूर प्रथा का बड़े विस्तार के साथ उल्लेख किया है। अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर यह अनुमान किया गया है कि यह प्रथा केवल नायकों एवं राजपरिवारों तक ही सीमित थी। डुआर्ट बारबोसा ने लिखा है कि यह प्रथा लिंगायतों, चेट्टियों ओर ब्राह्यणों में प्रचलित नहीं थी। सती होने वाली स्त्रियें की स्मृति में पाषाण स्मारक लगाये जाते थे। फिर भी यह प्रथा सैद्धान्तिक रुप से प्रचलित नहीं थी, यद्यपि इसे सम्माननीय समझा जाता था। सतीप्रथा के सम्बन्ध में राज्य का दृष्टिकोण तटस्थ नहीं था। विधवा विवाह करनेवाले युगल विवाह कर से मुक्त थे। अतः प्रतीत होता है कि राज्य व्यावहारिक दृष्टि से सतीप्रथा को प्रश्रय नहीं देता था।
राजपूताना में सतीप्रथा का प्रचलन बहुत ज्यादा था। अधिकांश राजपूत स्त्रियाँ अपने पति की चिता पर इच्छा या अनिच्छा से चढ़ जाती थी। औसतन हर राजपूत राजकुमारी सती होने के अवसर का स्वागत करती थी और मृत पति को अकेले न जलने देती थी। कर्नल टॉड लिखता है कि दूसरे देशों की स्त्रियें को राजस्थानी स्त्रियों का भाग्य भयभीत कर देनेवाली कठिनाईयें से भरा हुआ दिखाई देगा। जीवन के प्रत्येक चरण में मृत्यु उन्हें अंगीकार करने के लिए खड़ी है। जन्म के समय विष एवं युवा होने पर अग्नि की लपटें। उनका सुरक्षित जीवन युद्ध की अनिश्चितता पर आधारित है जो कभी भी बारह महीने से अधिक नहीं है। चूँकि राजपूत सरदार आदतन अनेक विवाह करते थे, इसलिए उनकी स्त्रियाँ बड़ी संख्या में पति के मरने के बाद बलिदान करती थी। इब्नबतूता ने ‘रेहला’ में आमीझरा (अमझौर) का उल्लेख किया है जहाँ उसने सामुहिक रुप से सतियों को अग्नि में प्रवेश करते हुए देखा था, ये महिलाएँ राठौड़ परिवार से सम्बन्ध रखती थी। मनुची लिखता है कि उसने राजपूत विधवाओं को अनेक बार अपने मृत पति के साथ जलते हुए देखा है। इसका बडा दल होता था जिसमें कभी - कभी एक साथ 15, 20 और यहाँ तक कि 30 विधवाएँ होती थी। यदि पति की एक से भिन्न जाति की एक से अधिक पत्नियाँ होती थी तो केवल पटरानी को ही मृत पति की चिता पर जलने की अनुमति दी जाती थी जबकि अन्य रानियाँ अलग - अलग चिताओं पर जलती थी। राजा जयसिंह की मृत्यु के बाद उसकी पटरानी सुरेन्द्रवती अन्य दो रानियों बेलावती और कृति के साथ चिता में प्रवेश कर गई थी। राजा रतनसिंह की मृत्यु के बाद पद्मावती एक अन्य रानी नागमति के साथ सहमरण द्वारा सती हुई थी। मृगावती में कुतुबन लिखते हैं कि राजकुँवर की मृत्यु के बाद मृगावती, रुक्मिणी और रनिवास की (84) चौरासी महिलाओं ने जलकर मृत्यु का वरण किया था। राजपूताना से प्राप्त सती सम्बन्धी शिलाओं और फलकों पर अंकित लेखों से स्पष्ट होता है कि राजपूतों द्वारा सती स्मारक बड़े पैमाने पर बनवाये जाते थे। मारवाड़ के महाराणा प्रताप, मालदेव, जसवंत सिंह, बीकानेर के राय सिंह अैर कोटा के भीमसिंह जैसे शासकों की रानियाँ अपने पति की चिता में भस्मीभूत हुई थी।
मुगल काल में सतीप्रथा कमोवेश बाध्यकारी सी हो गई थी। भूख, नफरत और परिवार की दासता की भयानक जिन्दगी बिताने के बजाय विधवायें अपने स्वर्गीय पति से पुनर्मिलन की आशा में उसके साथ जलकर कष्टपूर्ण मृत्यु को श्रेयस्कर मानती थी। इस तरह यह अस्वाभाविक नहीं था कि मध्यकालीन हिन्दू समाज में सतीप्रथा अत्यधिक सामान्य हो गई। अकबर के दरबार में आनेवाले फादर मांसेराट ने लिखा है कि हिन्दुओं के उच्चवर्ग की प्रसिद्ध जाति ब्राह्मणों की पत्नियॉँ अपने धर्म की प्राचीन परम्पराओं के अनुसार इसके लिए अभ्यस्त है कि अपने मृत पति की चिता पर उसी के साथ जल मरे। डेलावैले के अनुसार “भारत की स्त्रियाँ“ अपने पति को इतनी तीव्रता से प्यार करती है कि जब उसके पति की मृत्यु हो जाती है तो उसके साथ जल मरने का संकल्प करती है।“ इब्नबतूता, मनूची, पेलसर्ट, बर्नियर टैवरनियर तथा फोस्टर लगभग सभी तत्कालीन विदेशी यात्रियों ने अपने यात्रावृतांत में किसी न किसी रूप में सती प्रथा का वर्णन किया है।
सतीप्रथा का एक अन्य प्रारुप जो राजस्थान में प्रचलित था जिसे ‘‘जौहर प्रथा’’ कहा जाता थाय के अंतर्गत महिलाएॅँ अपने पति की मृत्यु का इंतजार किए बिना ही अपने जीवन का अंत कर देती थी। जौहर एवं सती में फर्क यह था कि जौहर मृत्यु की संभावना मात्र से ही चिता जलाकर मरने की प्रथा थी जबकि सती पति की मृत्यु के बाद सहमरण या अनुमरण विधि से आत्मदाह की प्रथा थी। जेम्स टॉड लिखता है कि राजपुतिनों का भाग्य भयानक कठिनाईयों का होता था। जीवन के हर चरण में मृत्यु उनको अपने आलिंगन में लेने के लिए तैयार थी। किसी युद्ध में उनके पति की पराजय या शत्रु द्वारा किसी नगर का घेरा, उन लोगों के लिए संकेत था कि वे गिरफ्तारी और उनके भयानक खतरों से, जो राजपुतिनों के लिए मृत्यु से भी बदतर था, यह प्रथा जौहर राजपूतों के अंतर्राष्ट्रीय युद्धों में सामान्य थी। जब राजपूत सरदार या उनके योद्धा किसी युद्ध अभियान में हारकर निराश हो जाते थे, वे अपने यहाँ की महिलाओं और बच्चों को मार डालते थे या उनको किसी भुमिगत घर के भीतर ताले में बंद कर उसमें आग लगा देते थे और फिर हाथ में तलवार लिए हुए वे अपनी निश्चित परन्तु शौयपूर्ण मृत्यु की ओर अग्रसर होते थे।
खिलजी सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने जब रणथम्भौर पर आक्रमण किया था तब वहाँ के राणा ने पहाड़ के शिखर पर आग लगा दी और अपने यहाँ की महिलाओं एवं बच्चों को उसमे फेंक दिया तथा अपने कुछ निष्ठावान समर्थकों को साथ लिए हुए शत्रु से भिड़ गया एवं साथियों के साथ जीवन होम कर दिया। काम्पिल्य के राय ने उस समय जौहर किया जब मुहम्मद बिन तुगलक अपने विद्रोही सरदार गुहतास्प को गिरफ्तार करने के लिए उसका किला घेरा था। इब्नबतूता के अनुसार “राय ने भीषण आग लगवाई और अपनी रानियों, अमीरों की पत्नियों तथा सारी सम्पत्ति को जला डाला, फिर हाथ मे बिना ढ़ाल लिए नंगी तलवार लेकर चुने हुए सरदारों के साथ सुल्तान की सेनाओं पर धावा बोल दिया और लड़ते-लड़ते मारा गया।“
मध्य काल मे प्रचलित देवदासी प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही परम्पर का ही विस्तार था। इटालियन पर्यटक मार्कोपोलो ने लिखा है कि माता-पिता कभी-कभी अपनी अविवाहित पुत्रियों को उन देवताओं के मंदिरों में जिनमें उनकी अपार श्रद्धा थी, पर्व एवं समारोहों में नाचने-गाने के लिए तथा सेवा करने के लिए भेज देते थे, जब तक उनकी शादी नहीं हो जाती थी। मालावार की स्त्रियाँ शिव की प्रतिमा पूजती थी और अपने पुत्री को उन्हें अर्पित करती थी। फरिश्ता के अनुसार अलाउद्दीन बहमनशाह ने जब कर्नाटक पर कब्जा किया तो उसने चार सौ देवदासियों को पकड़ा था। विजयनगर में रथयात्रा के समय नत्तर्कियों का कर्त्तव्य होता था कि वे तीर्थमंदिर में नाचे, भक्तिगीत गाये और देवताओं को प्रसन्न करे। राजतरंगिणी में भी कश्मीर के मंदिरों मे देवदासियों की उपस्थिति का वर्णन मिलता है।
1351 ई0 में भारत भ्रमण पर आए दो अरब यात्रियें ने इस देश की वेश्याओं को ही देवदासी समझ लिया था। उनका मानना था कि संतान की मनोकामना रखनेवाली किसी स्त्री की मानता पूरी होने पर यदि उसे सुन्दर पुत्री प्राप्त हुई तो वह बोंड नाम से पहचानी जानेवाली मूर्त्ति के पास ले जाकर वहाँ समर्पित कर देती थी। यह कन्या रजस्वला होने पर किसी सार्वजनिक स्थान पर निवास करने लगती थी। वहाँ से आने - जानेवाले राहगीरों की प्रतीक्षा करती थी। कीमत तय कर स्वतः का शरीर समर्पित करती थी। इस तरीके से एकत्रित समूची धनराशि वह मूर्ति के पुजारी को सौंपती थी। कालांतर में मुस्लिम अनुयायियों ने भी अपने अराधना स्थलों को कन्या अर्पित करने की प्रथा शुरु की। लखनऊ में ऐसी प्रथा को ‘अछूती’ कहा जाता था। इन्होंने अपने लिए एक मुहल्ले का निर्माण कर लिया, इसका साक्ष्य अभी भी लखनऊँ में अछूती गली के नाम से मिलता है।
अपनी मन्नत पूरी करने के लिए देव प्रतिमाओं के सामने नग्न - पूजा की प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। कर्नाटक के शिमोगा जिले के चन्द्रगुती गाँव के रेणुकोम्बन मंदिर में यह प्रथा 8वीं शताब्दी से ही चली आ रही है। भक्तों मे यह धारणा बनी हुई थी कि यह पूजा करने से जीवन की सारी कठिनाईयाँ दूर हो जाती हैं तथा देवी की कृपा भी शीघ्र प्राप्त होती है। धार्मिक विधान यह भी रहा है कि एक बार यदि कोई व्यक्ति नग्न पूजा शुरु करता है तो उसे यह परम्परा अपने परिवार मे पीढ़ी - दर - पीढ़ी कायम रखनी होगी। इस प्रथा का उल्लंधन करने से घर संकटों से घिर जाएगा, घातक बीमारियाँ होंगी, मवेशी काल कवलित होगे और व्यक्ति गूँगा ओैर बहरा हो जाएगा।
उड़ीसा में देवदासी परम्परा का प्रचलन जगन्नाथ मंदिर, कोणार्क मंदिर एवं लिंगराज मंदिर में मिलता हैं। जगन्नाथ मंदिर समुह की देवदासियों ने कभी यौन - व्यवसाय में अपनी संलग्नता प्रदर्शित नहीं की। देवदासी बनने के बाद भी वे कुमारिका ही रही। उड़ीसा में देवदासी को ‘महारी’ अर्थात् ‘मोहन नारी’ कहा जाता था। जो देवताओं को अर्पित कर दी गई थी। महारी की व्याख्या करते हुए नृत्यगुरु पंकज चरण दास कहते है कि ऐसी नारी जिसने पाँच शत्रुओं पर विजय पाई हो । 14वीं सदी में उड़ीसा में हुई मुसलमानों के घुसपैठ के पश्चात् महारी परम्परा विनष्ट हो गई। 1360 ई0 के बाद सुल्तानशाह के आक्रमण के पश्चात् देवदासी प्रथा क्षरित होती गई, क्योंकि सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक परिवेश तेजी से बदले तथा महिलाओं में स्वतंत्रता तथा शक्ति सम्पन्नता घटती गई। 17वीं शताब्दी के फ्रांसीसी पर्यटक वनिर्यर के विवरण से पता चलता है कि भगवान जगन्नाथ के नाम पर पुजारियों द्वारा इन औरतों का यौन - शोषण किया जाता था।
मध्यकाल में वेश्याओं या गणिकाओं की संख्या में काफी वृद्धि हो गई थी। इस समूह में नत्तर्की, वेश्या, गणिका या पातुर सभी को शामिल कर लिया गया था। सरलादास द्वारा वर्णित उड़िया समाज में वेश्यावृत्ति के लिए ‘प्रमदा’ शब्द का प्रयोग मिलता है। अपनी जीविका अर्जित करने के लिए वेश्याएँ किसी पुरुष को चाहे उसकी उम्र और जाति कुछ भी हो अपना शरीर अर्पित करती थी। ब्राह्मण विधवाएँ शूद्रों के साथ अनैतिक सम्बन्ध रखती थी; ऐसी विधवाएॅ समाज से बहिष्कृत होकर वेश्या बन जाती जाती थी। वेश्याओं को समाज में एक बुराई माना जाता था। उनकी तुलना चंडाल जाति की लड़कियों से की जाती थी। थैवनॉट बंगाली लोगों में प्रचलित काम वासना का वर्णन करते हुए कहता है “स्त्रियाँ दुःसाहसी और कामुक है और युवकों खासकर सुन्दर और सुवेशधारी अजनबी लोगों को अपने जाल फाँस लेती है और पैसे ठग लेती है।“
पृथ्वीराज रासो में चित्ररेखा नामक वेश्या की कहानी है जबकि विद्यापति ने कीर्तिलता में जौनपुर की सुन्दर वेश्याओं का वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि उन वेश्याओं को केवल धन से लगाव था, उनकी लज्जालुता अस्वाभाविक थी और उनका सौंदर्य कृत्रिम तथा उनके माथे का सिंदुर अपवित्र लगता था। इब्नबतूता ने दौलताबाद में गणिकाओं के बाजार ‘तारवाड़सुख’ का वर्णन बड़े रोचक ढ़ंग से किया है।कालीकट की वेश्याओं के बारे में निकोलो कोंटी कहता है कि उन्हें हर जगह पाया जा सकता है। ये शहर के सभी भागों में खास मकानों में रहती है। ये अपने शरीर में सुगंधित द्रव्य, मरहम, हाव - भाव और प्रलोभन सुन्दरता एवं यौवन से पुरुषों को आकर्षित करती है।
दिल्ली सल्तनत में वेश्यावृत्ति बड़े पैमाने पर प्रचलित थी। अलाउद्दीन खिलजी को दिल्ली में बढ़ती हुई वेश्याओं की संख्या से काफी असहजता महसूस हुई फलतः कुछ वेश्याओं का विवाह कर दिया गया जिससे उनकी संख्या में कुछ कमी आई। अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन खिलजी के वेश्यावृत्ति पर रोक लगाने और वेश्याओं द्वारा अपने पूर्व कर्मो पर पश्चाताप किए जाने का वर्णन खजाएन उल-फुतुह नामक पुस्तक में की है। मुगल शासक जहाँगीर और शाहजहाँ नत्तर्कियों के साथ रहने के बड़े शौकिन थे और वे वेश्याओं को पर्याप्त प्रोत्साहन देते थे। 16 वीं सदी की रचना हिततरंगिणी मे वेश्याओं की तीन कोटियाँ बताई गई है। गणिका, विलासिनी और रुपाजीवा। बदायूँनी के अनुसार राजधानी नगर दिल्ली में वेश्याओं की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि उनकी गिनती करना असंभव हो गया था। लाहौर नगर में वेश्यावृत्ति पर रोक लगाने के लिए अकबर ने इनके लिए शहर में एक विशेष क्षेत्र निश्चित कर उसका नाम ‘शैतानपुरी’ रख दिया तथा शहर के सभी बदनाम स्त्रियों को वहाँ रहने के लिए बाध्य कर दिया। औरंगजेब ने अपनी विशुद्धतावादी दृष्टिकोण के चलते वेश्याओं को आदेश दिया कि या तो वे विवाह कर ले या देश छोड़कर चली जाय। लेकिन मनुची के अनुसार सम्राट का आदेश मृतपत्र साबित हुआ, वेश्यावृत्ति इस समय अपने चरम पर था क्योंकि ओविंगटन सूरत से लिखता है कि 1689 ई0 मे यहाँ अनेक वेश्याएँ और नर्त्तकियां थी।
विजयनगर साम्राज्य में गणिकाओं का सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान था। समकालीन साहित्य में चारों वर्णों के साथ इन गणिकाओं के सम्बन्ध का उल्लेख है। ये गणिकाएँ दो वर्गों में विभक्त थी एक तो वे जो मंदिरों से सम्बद्ध थी यानी देवदासी और दूसरी वे जो स्वतंत्र जीवन-यापन करती थीं। गणिकाएँ चाहे किसी भी जाति या समुदाय की हो उसकी जाति एक होती थी। इस वर्ग की स्त्रियॉँ पर्याप्त रुप से शिक्षित होती थी। अधिकांश गणिकाएँ धनाढ़य और विशेषाधिकार प्राप्त होती थी। गरीब माता - पिता अपनी युवा पुत्रियों को या तो गणिकाओं को सौंप देते थे अथवा बेंच देते थे। विशेष बात यह है कि इन गणिकाओं को समाज में हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता था। सार्वजनिक उत्सवों पर समस्त गणिकाएँ अनिवार्यतः भाग लेती थी। राजा और सामंत दोनों निःसंकोच रुप से गणिकाओं से सम्पर्क रखते थे।
मध्यकाल में वेश्याओं की वृद्धि के पीछे बालविवाह एक प्रमुख कारण था। आठ या नौ वर्ष की लड़की जब विधवा होती थी तो यौवनावस्था तक पहुँचने पर अपनी यौवनेच्छा की पूर्ण के लिए वेश्यावृत्ति का धंधा अपना लेती थी। मनूची के अनुसार कुछ मूलतः हिन्दू विधवायें थी जिन्होंने अपनी शील और ख्याति खो दी थीय फिर उन्होंने बड़े शहरों मे जाकर यह पेशा अपना लिया था। कुछ वैसी हिन्दू महिलायें थी जिन्होंने अपने पति के जीवितावस्था में ही इस पेशे में आ गई थी। सती होने की कठिन सामाजिक प्रथा भी वेश्याओं के वृद्धि के लिए जिम्मेदार थी। स्टेवोरिनस लिखता है कि वेश्याओं को असम्मानजनक नहीं समझा जाता था। हर नगर में लाइसेंस प्राप्त स्थान थे जहाँ बूरे चरित्र की अनेक स्त्रियाँ रखी जाती थी। वेश्यावृत्ति राज्य के राजस्व का एक महत्वपूर्ण श्रोत था। कंचन नामक लड़कियाँ मूलतः नर्तकियाँ होती थी। जहाँ वेश्याएँ नही होती थी, वहाँ ये लड़कियाँ नृत्य करती थी।
1351 ई0 में भारत भ्रमण पर आए दो अरब यात्रियें ने इस देश की वेश्याओं को ही देवदासी समझ लिया था। उनका मानना था कि संतान की मनोकामना रखनेवाली किसी स्त्री की मानता पूरी होने पर यदि उसे सुन्दर पुत्री प्राप्त हुई तो वह बोंड नाम से पहचानी जानेवाली मूर्त्ति के पास ले जाकर वहाँ समर्पित कर देती थी। यह कन्या रजस्वला होने पर किसी सार्वजनिक स्थान पर निवास करने लगती थी। वहाँ से आने - जानेवाले राहगीरों की प्रतीक्षा करती थी। कीमत तय कर स्वतः का शरीर समर्पित करती थी। इस तरीके से एकत्रित समूची धनराशि वह मूर्ति के पुजारी को सौंपती थी। कालांतर में मुस्लिम अनुयायियों ने भी अपने अराधना स्थलों को कन्या अर्पित करने की प्रथा शुरु की। लखनऊ में ऐसी प्रथा को ‘अछूती’ कहा जाता था। इन्होंने अपने लिए एक मुहल्ले का निर्माण कर लिया, इसका साक्ष्य अभी भी लखनऊँ में अछूती गली के नाम से मिलता है।
अपनी मन्नत पूरी करने के लिए देव प्रतिमाओं के सामने नग्न - पूजा की प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। कर्नाटक के शिमोगा जिले के चन्द्रगुती गाँव के रेणुकोम्बन मंदिर में यह प्रथा 8वीं शताब्दी से ही चली आ रही है। भक्तों मे यह धारणा बनी हुई थी कि यह पूजा करने से जीवन की सारी कठिनाईयाँ दूर हो जाती हैं तथा देवी की कृपा भी शीघ्र प्राप्त होती है। धार्मिक विधान यह भी रहा है कि एक बार यदि कोई व्यक्ति नग्न पूजा शुरु करता है तो उसे यह परम्परा अपने परिवार मे पीढ़ी - दर - पीढ़ी कायम रखनी होगी। इस प्रथा का उल्लंधन करने से घर संकटों से घिर जाएगा, घातक बीमारियाँ होंगी, मवेशी काल कवलित होगे और व्यक्ति गूँगा ओैर बहरा हो जाएगा।
उड़ीसा में देवदासी परम्परा का प्रचलन जगन्नाथ मंदिर, कोणार्क मंदिर एवं लिंगराज मंदिर में मिलता हैं। जगन्नाथ मंदिर समुह की देवदासियों ने कभी यौन - व्यवसाय में अपनी संलग्नता प्रदर्शित नहीं की। देवदासी बनने के बाद भी वे कुमारिका ही रही। उड़ीसा में देवदासी को ‘महारी’ अर्थात् ‘मोहन नारी’ कहा जाता था। जो देवताओं को अर्पित कर दी गई थी। महारी की व्याख्या करते हुए नृत्यगुरु पंकज चरण दास कहते है कि ऐसी नारी जिसने पाँच शत्रुओं पर विजय पाई हो । 14वीं सदी में उड़ीसा में हुई मुसलमानों के घुसपैठ के पश्चात् महारी परम्परा विनष्ट हो गई। 1360 ई0 के बाद सुल्तानशाह के आक्रमण के पश्चात् देवदासी प्रथा क्षरित होती गई, क्योंकि सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक परिवेश तेजी से बदले तथा महिलाओं में स्वतंत्रता तथा शक्ति सम्पन्नता घटती गई। 17वीं शताब्दी के फ्रांसीसी पर्यटक वनिर्यर के विवरण से पता चलता है कि भगवान जगन्नाथ के नाम पर पुजारियों द्वारा इन औरतों का यौन - शोषण किया जाता था।
मध्यकाल में वेश्याओं या गणिकाओं की संख्या में काफी वृद्धि हो गई थी। इस समूह में नत्तर्की, वेश्या, गणिका या पातुर सभी को शामिल कर लिया गया था। सरलादास द्वारा वर्णित उड़िया समाज में वेश्यावृत्ति के लिए ‘प्रमदा’ शब्द का प्रयोग मिलता है। अपनी जीविका अर्जित करने के लिए वेश्याएँ किसी पुरुष को चाहे उसकी उम्र और जाति कुछ भी हो अपना शरीर अर्पित करती थी। ब्राह्मण विधवाएँ शूद्रों के साथ अनैतिक सम्बन्ध रखती थी; ऐसी विधवाएॅ समाज से बहिष्कृत होकर वेश्या बन जाती जाती थी। वेश्याओं को समाज में एक बुराई माना जाता था। उनकी तुलना चंडाल जाति की लड़कियों से की जाती थी। थैवनॉट बंगाली लोगों में प्रचलित काम वासना का वर्णन करते हुए कहता है “स्त्रियाँ दुःसाहसी और कामुक है और युवकों खासकर सुन्दर और सुवेशधारी अजनबी लोगों को अपने जाल फाँस लेती है और पैसे ठग लेती है।“
पृथ्वीराज रासो में चित्ररेखा नामक वेश्या की कहानी है जबकि विद्यापति ने कीर्तिलता में जौनपुर की सुन्दर वेश्याओं का वर्णन किया है। वे लिखते हैं कि उन वेश्याओं को केवल धन से लगाव था, उनकी लज्जालुता अस्वाभाविक थी और उनका सौंदर्य कृत्रिम तथा उनके माथे का सिंदुर अपवित्र लगता था। इब्नबतूता ने दौलताबाद में गणिकाओं के बाजार ‘तारवाड़सुख’ का वर्णन बड़े रोचक ढ़ंग से किया है।कालीकट की वेश्याओं के बारे में निकोलो कोंटी कहता है कि उन्हें हर जगह पाया जा सकता है। ये शहर के सभी भागों में खास मकानों में रहती है। ये अपने शरीर में सुगंधित द्रव्य, मरहम, हाव - भाव और प्रलोभन सुन्दरता एवं यौवन से पुरुषों को आकर्षित करती है।
दिल्ली सल्तनत में वेश्यावृत्ति बड़े पैमाने पर प्रचलित थी। अलाउद्दीन खिलजी को दिल्ली में बढ़ती हुई वेश्याओं की संख्या से काफी असहजता महसूस हुई फलतः कुछ वेश्याओं का विवाह कर दिया गया जिससे उनकी संख्या में कुछ कमी आई। अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन खिलजी के वेश्यावृत्ति पर रोक लगाने और वेश्याओं द्वारा अपने पूर्व कर्मो पर पश्चाताप किए जाने का वर्णन खजाएन उल-फुतुह नामक पुस्तक में की है। मुगल शासक जहाँगीर और शाहजहाँ नत्तर्कियों के साथ रहने के बड़े शौकिन थे और वे वेश्याओं को पर्याप्त प्रोत्साहन देते थे। 16 वीं सदी की रचना हिततरंगिणी मे वेश्याओं की तीन कोटियाँ बताई गई है। गणिका, विलासिनी और रुपाजीवा। बदायूँनी के अनुसार राजधानी नगर दिल्ली में वेश्याओं की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि उनकी गिनती करना असंभव हो गया था। लाहौर नगर में वेश्यावृत्ति पर रोक लगाने के लिए अकबर ने इनके लिए शहर में एक विशेष क्षेत्र निश्चित कर उसका नाम ‘शैतानपुरी’ रख दिया तथा शहर के सभी बदनाम स्त्रियों को वहाँ रहने के लिए बाध्य कर दिया। औरंगजेब ने अपनी विशुद्धतावादी दृष्टिकोण के चलते वेश्याओं को आदेश दिया कि या तो वे विवाह कर ले या देश छोड़कर चली जाय। लेकिन मनुची के अनुसार सम्राट का आदेश मृतपत्र साबित हुआ, वेश्यावृत्ति इस समय अपने चरम पर था क्योंकि ओविंगटन सूरत से लिखता है कि 1689 ई0 मे यहाँ अनेक वेश्याएँ और नर्त्तकियां थी।
विजयनगर साम्राज्य में गणिकाओं का सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान था। समकालीन साहित्य में चारों वर्णों के साथ इन गणिकाओं के सम्बन्ध का उल्लेख है। ये गणिकाएँ दो वर्गों में विभक्त थी एक तो वे जो मंदिरों से सम्बद्ध थी यानी देवदासी और दूसरी वे जो स्वतंत्र जीवन-यापन करती थीं। गणिकाएँ चाहे किसी भी जाति या समुदाय की हो उसकी जाति एक होती थी। इस वर्ग की स्त्रियॉँ पर्याप्त रुप से शिक्षित होती थी। अधिकांश गणिकाएँ धनाढ़य और विशेषाधिकार प्राप्त होती थी। गरीब माता - पिता अपनी युवा पुत्रियों को या तो गणिकाओं को सौंप देते थे अथवा बेंच देते थे। विशेष बात यह है कि इन गणिकाओं को समाज में हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता था। सार्वजनिक उत्सवों पर समस्त गणिकाएँ अनिवार्यतः भाग लेती थी। राजा और सामंत दोनों निःसंकोच रुप से गणिकाओं से सम्पर्क रखते थे।
मध्यकाल में वेश्याओं की वृद्धि के पीछे बालविवाह एक प्रमुख कारण था। आठ या नौ वर्ष की लड़की जब विधवा होती थी तो यौवनावस्था तक पहुँचने पर अपनी यौवनेच्छा की पूर्ण के लिए वेश्यावृत्ति का धंधा अपना लेती थी। मनूची के अनुसार कुछ मूलतः हिन्दू विधवायें थी जिन्होंने अपनी शील और ख्याति खो दी थीय फिर उन्होंने बड़े शहरों मे जाकर यह पेशा अपना लिया था। कुछ वैसी हिन्दू महिलायें थी जिन्होंने अपने पति के जीवितावस्था में ही इस पेशे में आ गई थी। सती होने की कठिन सामाजिक प्रथा भी वेश्याओं के वृद्धि के लिए जिम्मेदार थी। स्टेवोरिनस लिखता है कि वेश्याओं को असम्मानजनक नहीं समझा जाता था। हर नगर में लाइसेंस प्राप्त स्थान थे जहाँ बूरे चरित्र की अनेक स्त्रियाँ रखी जाती थी। वेश्यावृत्ति राज्य के राजस्व का एक महत्वपूर्ण श्रोत था। कंचन नामक लड़कियाँ मूलतः नर्तकियाँ होती थी। जहाँ वेश्याएँ नही होती थी, वहाँ ये लड़कियाँ नृत्य करती थी।
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